शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
कथं नु न भवेत्सत्यं तन्माधववचो महत् |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
इन्द्र उवाच
कथं नु नहुषो राज्यं देवानां प्राप दुर्लभम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
कथं नु नारी भर्तारमनुरक्तमनुव्रतम् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
कथं नु पाण्डवा राजन्प्रतिपत्स्यन्ति कौरवम् ||
६५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
कथं नु पाण्डवानां च पाञ्चालानां च पश्यताम् |
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
कथं नु पार्षतस्तात शत्रुभिर्दुष्प्रधर्षणम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
युधिष्ठिर उवाच
कथं नु पुरुषः कुर्यात्किं वा कृत्वा सुखी भवेत् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
धृतराष्ट्र उवाच
कथं नु पुरुषव्याघ्रः पञ्चत्वमुपजग्मिवान् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
युधिष्ठिर उवाच
कथं नु प्राप्यते शीलं श्रोतुमिच्छामि भारत |
३ क
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
कथं नु भवितास्येक इति त्वां नृप शोचिमि ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु भार्या पार्थानां तव कृष्ण सखी विभो |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु भीष्मश्च कृपश्च विप्रो; द्रोणश्च राजा च कुलस्य वृद्धः |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु मम कौरव्यो रत्नदानैः समाप्नुय़ात् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
युधिष्ठिर उवाच
कथं नु मुक्तः पृथिवीं चरेदस्मद्विधो नृपः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
७६
देवय़ान्यु उवाच
कथं नु मे मनस्विन्याः पाणिमन्यः पुमान्स्पृशेत् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु मे वरः पुत्रो लोकश्रेष्ठो भवेदिति ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
कथं नु युद्धं भविता कथं राजा भविष्यति |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
कथं नु राजंस्तृषितः क्षुधितः श्रमकर्शितः |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु राजा वृद्धः स वने वसति निर्जने |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु राजा वृद्धः सन्पुत्रशोकसमाहतः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
कथं नु रैभ्यः शक्तो मामधीय़ानं तपस्विनम् |
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु वातातपकर्शिताङ्गो; वृकोदरः कोपपरिप्लुताङ्गः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु विप्रमुच्येम भय़ादस्मादलक्षिताः ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु वृद्धमिथुनं वहत्यद्य पृथा कृशा ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
कथं नु शापेन न मां दहेय़ुर्व्राह्मणा इति ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु सत्यः शुचिरार्यवृत्तो; ज्येष्ठः सुतानां मम धर्मराजः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु सरणेऽशक्तान्पतने च ममात्मजान् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
कथं नु सर्वलोकस्य नावहास्या भवेमहि ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु सुकृतं च स्यान्मन्त्रय़ामास भारत ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु सुकृतं मे स्यान्नापराधवती कथम् |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
कथं नु हंसं वलिनं वज्राङ्गं दूरपातिनम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
जनमेजय़ उवाच
कथं नैनं विमार्गस्थं वारय़न्तीह वान्धवाः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
कथं नो वासविस्त्राय़ाच्छत्रुभ्य इति मारिष ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
कथं न्वशक्ता त्राणाय़ माता तेषां तपस्विनी |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
कथं न्वशक्ताः प्लवने लपिते मम पुत्रकाः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४७
युधिष्ठिर उवाच
कथं पञ्चगुणा वुद्धिः कथं पञ्चेन्द्रिय़ा गुणाः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
कथं पतितवृत्तस्य पृथिवी सुहृदां द्रुहः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१५०
युधिष्ठिर उवाच
कथं परसुतस्यार्थे स्वसुतं त्यक्तुमिच्छसि |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
१४
युधिष्ठिर उवाच
कथं परानुभावज्ञः स्वं प्रशंसितुमर्हति |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
कथं पश्येमहि वय़ं देवं नाराय़णं त्विति ||
२१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
कथं पाण्डुसुता युद्धे जेतव्याः सगणा इति ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
धृतराष्ट्र उवाच
कथं पाण्डुसुताश्चापि प्रत्यव्यूहन्त मामकान् |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
कथं पाण्डोर्न नश्येत सन्ततिः पुरुषर्षभाः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
कथं पारमगत्वा हि युद्धे त्वं वै जिजीविषुः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१०७
जनमेजय़ उवाच
कथं पुत्रशतं जज्ञे गान्धार्यां द्विजसत्तम |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
युधिष्ठिर उवाच
कथं पुत्रानतिक्रम्य तेषां नप्तृष्वथाभवत् |
६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
कथं पुत्रो भवत्यां स देवगर्भः पुराभवत् ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
कथं पुरुषशार्दूल शत्रुमध्ये विषीदसि ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
धृतराष्ट्र उवाच
कथं प्रकाशस्तेषां वा मम सैन्येषु वा पुनः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
कथं प्रणिपतेच्चाय़मिह कृत्वा पणं परम् |
९ क