आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
केकय़ेषु महात्मानः पार्थिवर्षभसत्तमाः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
जनमेजय़ उवाच
केकय़ैर्वृष्णिभिश्चैव पार्थिवैः शतशो वृतम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
केकय़ैश्चेदिकारूषैर्मत्स्यैरन्यैश्च भूमिपैः ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
केकय़ौ सात्यकिं युद्धे शरवर्षेण भास्वता |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
केचिच्च वारुणं लोकं केचित्कौवेरमाप्नुवन् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
केचिच्चिन्तापरास्तस्थुः केचित्तत्र विचुक्रुशुः ||
१११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
केचिच्चैनममन्यन्त तथा वै विमुखीकृतम् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
केचिच्छराक्षेपभय़ाच्छिरांस्यवननामिरे |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
केचिच्छाल्वपतिं गत्वा निय़ोज्यमिति मेनिरे |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
केचिच्छैलाम्वुदप्रख्याश्चक्रालातगदाय़ुधाः |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
केचिज्जहृषिरे तत्र केचिद्भीष्मं जगर्हिरे ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
केचित्कमलपत्राभाः केचिद्धिङ्गुलकप्रभाः ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
केचित्किञ्जल्कसङ्काशाः केचित्पीताः पय़ोधराः ||
६६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
केचित्क्रोधसमाविष्टा मदान्धा निरवग्रहाः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
केचित्तत्र नरव्याघ्रैरभक्ष्यन्त वुभुक्षितैः ||
२२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
केचित्तत्रैव घूर्णन्तो गतासव इवाभवन् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
केचित्त्वां वहु मन्यन्ते श्रैष्ठ्यं प्राप्तं स्वकर्मणा ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
केचित्पदातय़ः पद्भिर्मुष्टिभिश्च परस्परम् |
८५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
केचित्पुत्रानुपादाय़ हतभूय़िष्ठवाहनाः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
केचित्पुरवराकाराः केचिद्गजकुलोपमाः |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
केचित्पुरुषकारं तु प्राहुः कर्मविदो जनाः |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
व्रह्मो उवाच
केचित्पुरुषमव्यक्तं केचित्परमनामय़म् |
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
केचित्प्रहरणैश्छिन्ना विनिपेतुर्गतासवः ||
६९ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
केचित्संशय़ितं सर्वं निःसंशय़मथापरे ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
केचित्सर्वं परित्यज्य तूष्णीं ध्याय़न्त आसते ||
८ ग
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
केचिदग्निमथोत्पाद्य समिध्य च वनेचराः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
केचिदग्रासिना छिन्नाः पाण्डवेन महात्मना |
४६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
केचिदञ्जनपुञ्जाभाः केचिच्छ्वेताचलप्रभाः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
केचिदञ्जनसङ्काशाः केचिन्मकरसंस्थिताः |
६८ ख
वन पर्व
अध्याय
१००
लोमश उवाच
केचिदत्र महेष्वासाः शूराः परमदर्पिताः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४२
भीष्म उवाच
केचिदध्ययने युक्ता वेदव्रतपराः शुभाः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
केचिदन्यत्र गच्छन्तः पथि चान्यैरुपद्रुताः |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
केचिदभ्याहता नागा नागैर्नगनिभा भुवि |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
केचिदस्मदुपालम्भे मतिं चक्रुर्द्विजोत्तमाः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
केचिदाक्षिप्य करिणः साश्वानपि रथान्करैः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
केचिदार्तस्वरं चक्रुर्नागा मर्मणि ताडिताः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
केचिदार्तस्वरं चक्रुर्विनेदुरपरे पुनः |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
केचिदासन्निरुत्साहाः केचित्क्रुद्धा मनस्विनः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
केचिदासन्विमनसः केचिदासन्मुदा युताः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
केचिदाहुः पितुर्वेश्म नीय़तामिति तापसाः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
केचिदाहुर्युवा श्रीमान्नागराजकरोपमः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५६
सञ्जय़ उवाच
केचिदीश्वरनिर्दिष्टाः केचिदेव यदृच्छय़ा |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४२
भीष्म उवाच
केचिदुञ्छव्रतैः सिद्धाः स्वर्गमार्गसमाश्रिताः ||
१३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
केचिदूचुर्न तत्क्रुद्धैर्धार्तराष्ट्रैः कृतं रणे ||
११५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
केचिदूचुर्महेष्वासाः श्रुत्वा भीष्मस्य तद्वचः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
केचिदेकेन वाणेन सुमुक्तेन पतत्रिणा |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
केचिदेनं व्यवस्यन्ति पितामहसुतं प्रभुम् |
८५ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
केचिदेव तु संरव्धा मध्यस्थास्त्वपरेऽभवन् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
केचिदेव धनाध्यक्षं भ्रातरं मे समाश्रिताः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
शौनक उवाच
केचिदेव महाप्राज्ञाः परिज्ञास्यन्ति कार्यताम् |
२० क