chevron_left  केचिद्गुहाःarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
केचिद्गुहाः प्रविविशुर्निर्झरांश्चापरे श्रिताः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११
अर्जुन उवाच
केचिद्गृहान्परित्यज्य वनमभ्यगमन्द्विजाः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
केचिद्घण्टारवत्रस्ता निपेतुर्वसुधातले |
६९ ख
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
केचिद्दन्तैः करैः केचित्केचित्पद्भ्यां हता नराः ||
८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
केचिद्दुर्योधनं राजन्नर्द्यमानाः किरीटिना ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
केचिद्धर्मार्थसंय़ुक्ताः कथास्तत्र महाव्रताः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
केचिद्धस्तैर्द्विधा छिन्नैश्छिन्नगात्रास्तथापरे |
३४ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
केचिद्धारिद्रसङ्काशाः काकाण्डकनिभास्तथा |
६७ क
सभा पर्व
अध्याय १२
युधिष्ठिर उवाच
केचिद्धि सौहृदादेव दोषं न परिचक्षते |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
केचिद्भिन्ना विषाणाग्रैर्भिन्नकुम्भाश्च तोमरैः |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
सञ्जय़ उवाच
केचिद्भ्रान्तै रथैस्तूर्णं निहतपार्ष्णिय़न्तृभिः |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
केचिद्यानैर्नरा जग्मुः केचिदश्वैर्मनोजवैः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
केचिद्यूपान्समुत्पाट्य वभ्रमुर्विकृताननाः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु; सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
केचिद्विसान्यखनंस्तत्र राज; न्नन्ये मृणालान्यखनंस्तत्र विप्राः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
केचिद्विसूता विहय़ाश्च के चि; द्वैकर्तनेनाशु कृता वभूवुः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
व्रह्मो उवाच
केचिद्व्रह्ममय़ं वृक्षं केचिद्व्रह्ममय़ं महत् |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
केचिन्न सम्यक्पश्यन्ति मूढाः सम्यक्तथापरे |
५६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
केचिन्नागशतप्राणाः केचित्सर्वास्त्रकोविदाः |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
केचिन्नादानमुञ्चन्त केचिद्धासांश्च चक्रिरे |
३२ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित्कुमुदसंनिभाः |
६६ क
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
केचिन्नौभिर्व्यवस्यन्ति केचीच्च विविधैः प्लवैः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
केचिन्महेश्वरसुतं केचित्पुत्रं विभावसोः |
८६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
ऋषय़ ऊचुः
केचिन्मोक्षं प्रशंसन्ति केचिद्भोगान्पृथग्विधान् ||
१९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३४२
भीष्म उवाच
केचिन्मोक्षं प्रशंसन्ति केचिद्यज्ञफलं द्विजाः |
१० क
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
केतकैः करवीरैश्च पिप्पलैश्चैव संवृतम् |
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
केतनानां च जीर्णानामवेक्षा चैव सीदताम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
केतवो वाजिनः सूता रथिनश्चापतन्क्षितौ ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
केतवो विनिपात्यन्ते हस्त्यश्वं विप्रकीर्यते ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
केतुं निपतितं दृष्ट्वा श्रुताय़ुः स तु पार्थिवः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
केतुः काञ्चनचित्राङ्गैर्मय़ूरैरुपशोभितः ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
केतुना पञ्चतारेण तालेन भरतर्षभ |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
केतुमन्तं च नैषादिमाय़ान्तं सह चेदिभिः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
केतुमन्तं रणे भीमोऽगमय़द्यमसादनम् ||
७० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
केतुमन्तं वहन्त्यश्वास्तं दिव्यमजरं दिवि |
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
केतुमस्य हि पश्यामि धृष्टद्युम्नरथं प्रति |
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
केतुमानपि मातङ्गं विचित्रपरमाङ्कुशम् |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
केतुमानिति विख्यातो यस्ततोऽन्यः प्रतापवान् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
केतुमान्वसुदानश्च पुत्रः काश्यस्य चाभिभूः ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
केतुमान्वसुदानश्च वैदेहोऽथ कृतक्षणः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ८७
धौम्य उवाच
केतुमाला च मेध्या च गङ्गारण्यं च भूमिप |
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
केतुमेकेन चिच्छेद पाण्डवं चार्दय़त्त्रिभिः ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
केतुराचार्यमुख्यस्य द्रोणस्य धनुषा सह ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
केतुवर्मण्यभिहते धृतवर्मा महारथः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
केतुवर्मा तु तेजस्वी तस्यैवावरजो युवा |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
केदारश्च मतङ्गस्य महानाश्रम उत्तमः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
केदारे चैव राजेन्द्र कपिष्ठलमहात्मनः ||
५९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
उमो उवाच
केन कण्ठश्च ते नीलो वर्हिवर्हनिभः कृतः ||
४७ ख
विराट पर्व
अध्याय ४०
उत्तर उवाच
केन कर्मविपाकेन क्लीवत्वमिदमागतम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
उमो उवाच
केन कर्मविपाकेन प्रज्ञावान्पुरुषो भवेत् |
४४ क