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शान्ति पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
केन स्विद्वर्धते राष्ट्रं राजा केन विवर्धते |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
युधिष्ठिर उवाच
केन स्विद्व्राह्मणो जीवेज्जघन्ये काल आगते ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
केनचिद्धनशेषेण क्रीतवान्दम्यगोय़ुगम् ||
५ ख
मौसल पर्व
अध्याय २
जनमेजय़ उवाच
केनानुशप्तास्ते वीराः क्षय़ं वृष्ण्यन्धका यय़ुः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय २१५
वैशम्पाय़न उवाच
केनान्नेन भवांस्तृप्येत्तस्यान्नस्य यतावहे ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १२२
लोमश उवाच
केनापकृतमद्येह भार्गवस्य महात्मनः |
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
केनापाश्रय़वान्प्राप्तो ममैष भ्रातृगन्धिकः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
केनार्थेनोपसम्प्राप्ता भगवन्तो महीतलम् ||
६४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
केनावध्या महात्मानः पाण्डुपुत्रा महावलाः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ८७
अष्टक उवाच
केनासि दूतः प्रहितोऽद्य राज; न्युवा स्रग्वी दर्शनीय़ः सुवर्चाः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ६
सूत उवाच
केनासि रक्षसे तस्मै कथितेह जिहीर्षवे |
९ ख
विराट पर्व
अध्याय ३९
उत्तर उवाच
केनासि विजय़ो नाम केनासि श्वेतवाहनः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
युधिष्ठिर उवाच
केनास्मिन्व्राह्मणो जीवेज्जघन्ये काल आगते |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
केनास्यभिहत इति ||
३ ग
आदि पर्व
अध्याय ७६
देवय़ान्यु उवाच
केनास्यर्थेन नृपते इमं देशमुपागतः |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
केनास्यर्थेन सम्प्राप्ता त्वरितेव ममान्तिकम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
केनास्येवं कृता भद्रे मामचिन्त्यावमन्य च ||
४७ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
केनाय़ं ताडितो राजन्केन पापमिदं कृतम् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २४
देवमत उवाच
केनाय़ं सृज्यते जन्तुः कश्चान्यः पूर्वमेति तम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
साध्या ऊचुः
केनाय़मावृतो लोकः केन वा न प्रकाशते |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
उमो उवाच
केनाय़ुर्लभते दीर्घं कर्मणा पुरुषः प्रभो |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
केनेदानीं वृत्तिं कल्पय़सीति ||
३९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
केनेमौ मर्त्यधर्माणौ नावधीत्केशवार्जुनौ |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
जनमेजय़ उवाच
केनैष धर्मः कथितो देवेन ऋषिणापि वा ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
वासुदेव उवाच
केनोभौ कर्मपन्थानौ महत्त्वं केन विन्दति |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
केवलं गुणसम्पन्नः शुचिरेव नरः सदा ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
केवलं तव वीर्येण तिष्ठामि मधुसूदन ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
केवलं त्वभिमानित्वाद्गुणेष्वगुण उच्यते ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
केवलं दण्डरुचय़ो भविष्यन्ति युगक्षय़े ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
केवलं नामगोत्रेण प्राय़ुध्यन्त जय़ैषिणः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
केवलं पञ्चविंशं च चतुर्विंशं न पश्यति ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
केवलं पुरुषस्तेन सेवितो हरिरीश्वरः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
केवलं वाहुवीर्येण क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
केवलं विधिमासाद्य सहाय़ः किं करिष्यति ||
३१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
केवलं वृष्णिचक्रं तु वासुदेवपरिग्रहात् |
३४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
केवला भोक्तुमस्माभिरतश्चैतत्कृतं मय़ा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
केवलाकेवलं चाद्यं पञ्चविंशात्परं च यत् ||
७९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
केवलाचरितत्वात्तु निपुणान्नाववुध्यसे ||
४९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
केवलाजिनसंवीताः कूर्दन्त्यः प्रिय़दर्शनाः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
केवलात्पुनराचारात्कर्मणो नोपपद्यते |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
केवलात्मा तथा चैव केवलेन समेत्य वै |
२९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
द्रौपद्यु उवाच
केवलानृण्यमाप्तास्मि गुरुपुत्रो गुरुर्मम |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
केवलेन वलेनैव समतां यात्यसंशय़म् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
केवलेन समागम्य विमुक्तोऽऽत्मानमाप्नुय़ात् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
केवलेनेह पुण्येन गतिमूर्ध्वामवाप्नुय़ात् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
केशकीटावपतितं क्षुतं श्वभिरवेक्षितम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
केशग्रहान्प्रहारांश्च शिरस्येतान्विवर्जय़ेत् ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
केशपक्षं वरारोहा गृह्य सव्येन पाणिना ||
३४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १४
भीमसेन उवाच
केशपक्षपरामर्शे द्रौपद्या द्यूतकारिते |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २३
कुन्त्यु उवाच
केशपक्षे परामृष्टा पापेन हतवुद्धिना |
१३ क