chevron_left  विप्रकीर्यन्तarrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
विप्रकीर्यन्त सहसा वातनुन्ना घना इव ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय १३६
लोमश उवाच
विप्रकुर्वन्नृषीनन्यानतुष्यत्परय़ा मुदा ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४७
नागभार्यो उवाच
विप्रक्षत्रिय़वैश्यानां शुश्रूषा शूद्रकर्म तत् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
भीष्म उवाच
विप्रक्षत्रिय़सम्वाधां वैश्यशूद्रसमाकुलाम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
विप्रचित्तिं च दैतेय़ं दनोः पुत्रांश्च सर्वशः |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
विप्रचित्तिं दुराधर्षं देवतानां भय़ङ्करम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
विप्रचित्तिप्रधानांश्च दानवानसृजद्दनुः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
विप्रचित्तिरिति ख्यातो य आसीद्दानवर्षभः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
विप्रजग्मुः समुत्सृज्य द्वैरथानि समन्ततः ||
६९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
विप्रजग्मुरनीकेषु मेघा वातहता इव |
७६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
विप्रजग्मुर्महाराज यथेच्छकमरिन्दमाः ||
२३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
विप्रजग्मुर्यथाकामं ते सिद्धगतिमास्थिताः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
विप्रदुद्राव वेगेन श्रुताय़ुः समरे तदा ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
विप्रद्रवन्तं सहसा ददर्श मधुसूदनः ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
विप्रद्रुतरथाः केचिद्दृश्यन्ते रथय़ूथपाः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
विप्रद्रुता दिशो राजन्वध्यमाना महात्मना ||
३३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
विप्रद्रुता व्यदृश्यन्त प्राकृता इव मानवाः ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
विप्रद्रुताः शुष्कमुखा विसञ्ज्ञा; गाण्डीवघोषेण समाहताश्च |
६१ क
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
विप्रद्रुतानहं मन्ये निमग्नः शोकसागरे |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
विप्रद्रुताश्वाः समरे दिशो जग्मुः समन्ततः ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
विप्रद्रुते वले तस्मिन्वध्यमाने समन्ततः |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
विप्रद्रुतेष्वनीकेषु विध्वस्तेषु समन्ततः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
विप्रधर्मश्च सुगुरुर्मामनात्मानमाविशत् ||
१०८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
विप्रधावति वेगेन भीमस्य निहता शरैः ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
विप्रनष्टां श्रिय़ं चाय़माहर्ता पुरुषर्षभः ||
३५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
विप्रनष्टाश्च तेऽन्योन्यं नाजानन्त तदा विभो |
९६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
विप्रमध्ये पठिष्यन्ति न ते प्राप्स्यन्ति किल्विषम् ||
६२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
विप्रमुक्तश्च तैर्भूतैः पुनर्यात्यपरां गतिम् |
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
विप्रमुक्तास्तु ते योधाः फल्गुनस्य रथं प्रति |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
विप्रमुक्तोऽथ मार्जारस्तमेवाभ्यपतद्द्रुमम् ||
११५ ख
आदि पर्व
अध्याय १८१
कर्ण उवाच
विप्ररूपं विधाय़ेदं ततो मां प्रतिय़ुध्यसे ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
विप्रर्षभमुवाचेदं सर्वधर्मभृतां वरः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
विप्रर्षभाणामुपविश्य मध्ये; सर्वं यथावत्कथय़ां वभूव ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
विप्रलम्भं यथावृत्तं स च चुक्रोध पार्थिवः ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
व्यास उवाच
विप्रलम्भमुपाध्याय़ात्सर्वमेव न्यवेदय़त् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
विप्रलम्भोऽय़मत्यन्तं यदि स्युरफलाः क्रिय़ाः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७७
भगवानु उवाच
विप्रलुप्तं च वो राज्यं नृशंसेन दुरात्मना |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
युधिष्ठिर उवाच
विप्रवादाः सुवहुशः श्रूय़न्ते पुत्रकारिताः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
विप्रविद्धकुथावल्गाश्छिन्नभाण्डाः परासवः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
विप्रविद्धासिनखराश्छिन्नवर्मर्ष्टिशक्तय़ः |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
विप्रविद्धाय़ुधाङ्गाश्च द्विरदाश्वरथैर्हताः |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
विप्रविद्धैः कलापैश्च पतितैश्च शरासनैः |
६२ क
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
विप्रशापाभिभूते च क्षीणाय़ुषि नराधिपे |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
विप्रश्चेत्त्यागमातिष्ठेदाख्याय़ावृत्तिकर्शितः |
३ क
वन पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
विप्रसृत्य समाहृत्य व्राह्मणेभ्यो न्यवेदय़न् ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
विप्रस्य तपसा तस्य शिरो मे काञ्चनीकृतम् ||
८४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
विप्रस्य रशना मौञ्जी मौर्वी राजन्यगामिनी |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
वाय़ुरु उवाच
विप्रस्य सर्वमेवैतद्यत्किञ्चिज्जगतीगतम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
विप्रहाणाय़ दुःखस्य दुर्गतिर्ह्यन्यथा भवेत् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
विप्रा यमभिगच्छन्ति भिक्षमाणा गृहं सदा ||
२२ ख