आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
केशिन्यजनय़ज्जह्नुमुभौ च जनरूपिणौ ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
केशेष्वन्योन्यमाक्षिप्य चिच्छिदुर्विभिदुः सह ||
६२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
केशेष्वालम्व्य पाणिभ्यां निष्पिपेष महीतले ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सूत उवाच
केषां क्रुद्धोऽसि वार्ष्णेय़ केषां मृत्युरुपस्थितः |
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
धृतराष्ट्र उवाच
केषां जघन्यौ सोमसूर्यौ सवाय़ू; केषां सेनां श्वापदा व्याभषन्त |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
केषां प्रहृष्टास्तत्राग्रे योधा युध्यन्ति सञ्जय़ |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
धृतराष्ट्र उवाच
केषां यूनां मुखवर्णाः प्रसन्नाः; सर्वं ह्येतद्व्रूहि तत्त्वं यथावत् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
युधिष्ठिर उवाच
केषां राजा प्रभवति वित्तस्य भरतर्षभ |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
शिष्य उवाच
केषां वलावलं वुद्ध्या हेतुभिर्विमृशेद्वुधः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सूत उवाच
केषां वैवस्वतो राजा स्मरतेऽद्य महाभुज ||
१९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सूत उवाच
केषां संय़मनीमद्य गन्तुमुत्सहते मनः ||
१८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
केषाञ्चित्पुत्रकामानामनुसन्तानमिच्छताम् |
१६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
केषाञ्चिदच्छिनत्पक्षाञ्शिरांसि च चकर्त ह |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
केषाञ्चिदभवद्भ्राता केषाञ्चिदभवत्सखा |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
अर्जुन उवाच
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मय़ा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
केषु विश्वसितव्यं स्याद्राज्ञां कस्याञ्चिदापदि |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
केषेशु समसज्जन्त कवचेषु भुजेषु च ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
केसरस्याथ मोदाकी परेण तु महापुमान् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
केसरी केसरय़ुतो यतो वातः प्रवाय़ति ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
केसरीव यथोत्सिक्तः प्रभिन्न इव वारणः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
केसरीव वने मर्दन्मत्तमातङ्गय़ूथपान् |
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
केसरोत्करसंमिश्रमशोकानामिवोत्करम् ||
६९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
केऽजय़न्के जितास्तत्र हृतलक्षा निपातिताः |
६८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
केऽतिष्ठन्के न्यवर्तन्त केऽभ्यवर्तन्त सञ्जय़ ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
धृतराष्ट्र उवाच
केऽरक्षन्दक्षिणं चक्रं के च द्रोणस्य सव्यतः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
केऽरक्षन्दक्षिणं चक्रं भीष्मस्यामिततेजसः |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
केऽरक्षन्दक्षिणं चक्रं मद्रराजस्य संय़ुगे |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
केऽरक्षन्दक्षिणं चक्रं सव्यं के च महात्मनः |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
केऽरक्षन्दक्षिणं चक्रं सूतपुत्रस्य संय़ुगे |
१०२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
धृतराष्ट्र उवाच
केऽरक्षन्दक्षिणं चक्रमाचार्यस्य महात्मनः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
केऽरक्षन्नुत्तरं चक्रं वीरा वीरस्य युध्यतः ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
केऽरक्षन्पाण्डवानीके शिखण्डिनमुदाय़ुधम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
केऽय़ुध्यन्के व्यपाकर्षन्के क्षुद्राः प्राद्रवन्भय़ात् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
केय़ं कस्य कुतो वेति वभूवागतविस्मय़ः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
केय़ं च वृहती श्यामा सुकुमारी तवानघ |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
केय़ूरैरङ्गदैर्हारै राङ्कवैर्मृदितैस्तथा |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
कैकेय़ी सुमना नाम शाण्डिलीं पर्यपृच्छत ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
कैकेय़ीमभिगम्येदं काले वचनमव्रवीत् ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
कैकेय़्याः प्रेक्षमाणाय़ास्तदा मे कश्मलो भवेत् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
कैञ्चन्ये चेतरे चैव जन्तुर्ज्ञानेन मुच्यते ||
५० ख
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
कैटभो विटटूतश्च संह्रादश्चेन्द्रतापनः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
कैतवेनाक्षवत्यां वा युद्धे वा नम्यतां धनुः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
कैतव्य गत्वा भरतान्समेत्य; सुय़ोधनं धार्तराष्ट्रं व्रवीहि |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
कैतव्यानामधिपः शूरमानी; रणे रणे शत्रुहा राजपुत्रः |
१०२ क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
कैरातं वेषमास्थाय़ काञ्चनद्रुमसंनिभम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
कैरातं वेषमास्थाय़ योधय़ामास फल्गुनम् |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
कैरातिकानामय़ुतं दासीनां च विशां पते |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९५
वैशम्पाय़न उवाच
कैराते द्वन्द्वय़ुद्धे वै तदिदं मय़ि वर्तते ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
कैर्मय़ा सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो |
२१ क