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वन पर्व
अध्याय १०७
लोमश उवाच
कैलासं पर्वतं गत्वा तोषय़ामास शङ्करम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
कैलासं पर्वतश्रेष्ठं जगाम त्रिदशैः सह ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
कैलासं प्रस्थितां चापि नदीं गङ्गां महातपाः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
कैलासं मन्दरं हैमं सर्वाननुचचार ह ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय १४०
लोमश उवाच
कैलासः पर्वतो राजन्षड्योजनशतान्युत |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १०१
नारद उवाच
कैलासकः पिञ्जरको नागश्चैरावतस्तथा ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
कैलासपृष्ठादुत्पत्य स पपात दिवं तदा |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
कैलासमन्दराभ्यां तु तथा हिमवतो गिरेः |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
कैलासशिखरप्रख्यान्मनोज्ञान्द्रव्यभूषितान् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
कैलासशिखरप्रख्यैर्नभस्तलविलेखिभिः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
कैलासशिखरावासी हिमवद्गिरिसंश्रय़ः |
१०६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भीष्म उवाच
कैलासशिखरे दृष्ट्वा दीप्यमानमिवौजसा |
६ क
वन पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
कैलासशिखरे रम्ये ददर्श शुभकानने ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
कैलासशिखरे रम्ये देवगन्धर्वसेविते ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
कैलासशृङ्गसङ्काशौ श्वेतमाल्यानुलेपनौ |
२९ क
वन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
कैलासशृङ्गाण्यभिदुद्रुवुस्ते; भीमार्दिताः क्रोधवशाः प्रभग्नाः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
कैलासे हिमवत्पृष्ठे मन्दरे श्वेतपर्वते |
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
कैवल्या या गतिर्देव परमा सा गतिर्भवान् ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
को जातु न विचिन्वीत विद्वान्स्वां शक्तिमात्मनः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
को जातु परभावां हि नारीं व्यालीमिव स्थिताम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
को जिजीविषुरासीदेद्धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
को जीवितं रक्षमाणो हि तेन; युय़ुत्सते मामृते मानुषोऽन्यः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
को जीवितार्थी समरे प्रत्युदीय़ा; त्क्रुद्धान्सिंहान्केसरिणो यथैव ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
युधिष्ठिर उवाच
को दण्डः कीदृशो दण्डः किंरूपः किम्पराय़णः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
को दैवशप्तस्तत्कार्तुं विग्रहेण समाचरेत् ||
२६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
को द्रौणिं युधि संरव्धं योधय़ेदपि देवराट् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
युधिष्ठिर उवाच
को धर्मः कानि कर्माणि तन्मे व्रूहि पितामह ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः |
३ क
वन पर्व
अध्याय १२०
सात्यकिरु उवाच
को नाम साम्वस्य रणे मनुष्यो; गत्वान्तरं वै भुजय़ोर्धरेत ||
१३ ग
सभा पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
को नार्हं मन्यते कृष्णं को वाप्येनं न पूजय़ेत् ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
को नु तां सर्वधर्मज्ञां परिभूय़ यशस्विनीम् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
को नु तान्विपरीतात्मा युध्येत भरतर्षभ ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
को नु भीष्मं युधा जेतुमुत्सहेत महीपतिः ||
८ ग
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
को नु मामुत्थितं काल्ये तात तातेति वक्ष्यति |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
को नु मूढो न युध्येत पुरुषः क्षत्रिय़व्रुवः ||
५९ ग
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
को नु मे कथय़ेदद्य वनेऽस्मिन्विष्ठितं नलम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
को नु मे जीवितेनार्थस्तमृते पुरुषर्षभम् |
८५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
को नु मे जीवितेनार्थो राज्येनार्थोऽथ वा पुनः |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
को नु राजकुले जातः कौरवेय़ो विशेषतः |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
को नु सर्वान्विनिर्जित्य शत्रूनेकेन वैरिणा |
१० क
वन पर्व
अध्याय २९२
वैशम्पाय़न उवाच
को नु स्वप्नस्तय़ा दृष्टो या त्वामादित्यवर्चसम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
युधिष्ठिर उवाच
को नु हन्याद्रिपुं त्वादृङ्मुञ्चेमं रिपुसूदन ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
भीष्म उवाच
को न्वर्जुनक दोषोऽत्र विद्यते मम वालिश |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
अर्जुन उवाच
को न्वसौ व्राह्मणः कृष्ण कश्च शिष्यो जनार्दन |
४४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
को न्वेतद्वुध्यते साधु को न्वेतत्साधु पश्यति |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
को न्वेष संय़ुगे प्राज्ञः पुनर्द्वन्द्वे समाह्वय़ेत् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११८
नारद उवाच
को न्वय़ं कस्य वा राज्ञः कथं वा स्वर्गमागतः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
को न्वय़ं यो भगवता प्रणम्य विनय़ाद्विभो |
४ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
को भवानटते शून्ये वने स्त्रीगणसंवृतः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
को भवानिति पृष्टश्च तमाह स महाद्युतिः |
५१ क