द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
धृतराष्ट्र उवाच
कथं प्रत्युद्ययुर्द्रोणमस्यन्तं पाण्डुसृञ्जय़ाः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
कथं प्रवर्तेत तदा तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
कथं प्रवर्षेत्पर्जन्य उपाय़ः परिदृश्यताम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
जनमेजय़ उवाच
कथं प्रवृत्तिधर्मेषु भागार्हा देवताः कृताः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
धृतराष्ट्र उवाच
कथं प्रहरतां श्रेष्ठाः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
कथं प्रहर्तुमपि ते शेकुः सञ्जय़ पाण्डवाः ||
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय
१५
युधिष्ठिर उवाच
कथं प्रहिणुय़ां भीमं वलात्केवलसाहसात् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
कथं प्राप्तं महाराज क्षत्रिय़ेण महात्मना ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
कथं प्राप्स्यति वीभत्सुः सैन्धवं कालचोदितः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
कथं प्राय़ोपविष्टाय़ पार्थेन छिन्नवाहवे |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
कथं प्रिय़सखाय़ौ तौ भिन्नौ कस्य कृतेन च ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
जनमेजय़ उवाच
कथं प्रय़ातो दाशार्हो महात्मा मधुसूदनः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भीष्म उवाच
कथं भगीरथागास्त्वमिमं देशं दुरासदम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
युधिष्ठिर उवाच
कथं भवति पापात्मा कथं धर्मं करोति वा |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
उत्तङ्क उवाच
कथं भवन्तं जानीय़ामुपाध्याय़ाश्रमं प्रति |
४१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
कथं भवन्तं विद्याम यो नो यज्ञं विगर्हसे ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
८५
अष्टक उवाच
कथं भवन्ति कथमाभवन्ति; कथम्भूता गर्भभूता भवन्ति ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
८५
अष्टक उवाच
कथं भवन्ति कथमाभवन्ति; न भौममन्यं नरकं शृणोमि ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
कथं भवान्दुर्गतिमीदृशीं गतो; नरेन्द्र तद्व्रूहि किमेतदीदृशम् ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
कथं भवान्रणे कर्णं निहन्यादिति मे मतिः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
कथं भविष्यसि पुनर्मामनुस्मृत्य नैषध |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
कथं भविष्याम्यद्याहं भर्तृशोकाभिपीडिता ||
८५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
जनमेजय़ उवाच
कथं भागहराः प्रोक्ता देवताः क्रतुषु द्विज |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
कथं भिक्षुरय़ं प्राप्तः समुद्रे स्नात एव च ||
१६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
कथं भीमस्य वाक्यानि श्रोतुं शक्ष्यामि सञ्जय़ |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
धृतराष्ट्र उवाच
कथं भीमेन युय़ुधे कुन्त्या वाक्यमनुस्मरन् ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
कथं भीष्म न ते जिह्वा शतधेय़ं विदीर्यते ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
कथं भीष्मं परो हन्यादिति निश्चित्य भारत ||
५४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
धृतराष्ट्र उवाच
कथं भीष्मं स कौन्तेय़ः प्रत्यव्यूहत पाण्डवः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
कथं भीष्मेण सङ्ग्राममकुर्वन्पाण्डुनन्दनाः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
कथं भुक्त्वा स्वय़ं भोगान्दत्त्वा दाय़ांश्च पुष्कलान् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४८
युधिष्ठिर उवाच
कथं भूय़ः समुत्पत्तिः क्षत्रस्यामितविक्रम ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
धृतराष्ट्र उवाच
कथं भूय़स्तु राधेय़ो भीममागान्महारथः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
युधिष्ठिर उवाच
कथं भृत्यान्कथं दारान्कथं पुत्रांश्च भारत ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
४१
शिशुपाल उवाच
कथं भोजस्य पुरुषे वर्गपाले दुरात्मनि |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
कथं भ्रातॄन्हताञ्श्रुत्वा भर्तारं च स्वसा मम |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
कथं मध्यं प्रपद्येथाः शत्रूणां शत्रुकर्शन ||
२६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
कथं मन्येत विजय़ं ततो जिततरः परैः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
कथं महात्मा गाङ्गेय़ः सर्वशस्त्रभृतां वरः |
८८ क
वन पर्व
अध्याय
२१४
अग्निरु उवाच
कथं मां त्वं विजानीषे कामार्तमितराः कथम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
भीष्म उवाच
कथं मां वेत्सि चण्डालं क्षिप्रं रासभि शंस मे ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
कथं मामन्यकामां त्वं राजञ्शास्त्रमधीत्य वै |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
युधिष्ठिर उवाच
कथं मित्रमरिं चैव विन्देत भरतर्षभ |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
युधिष्ठिर उवाच
कथं मृदौ कथं तीक्ष्णे महापक्षे च पार्थिव |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
३२
शेष उवाच
कथं मे प्रेत्यभावेऽपि न तैः स्यात्सह सङ्गमः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
कथं मय़ा नानृतमुक्तमद्य; भवेत्कुरूणामृषभ व्रवीहि |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
द्वारपाल उवाच
कथं यज्ञं दशवर्षो विशेस्त्वं; विनीतानां विदुषां सम्प्रवेश्यम् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
कथं यज्ञे मरुत्तस्य द्रविणं तत्समाचितम् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५७
युधिष्ठिर उवाच
कथं यात्रा शरीरस्य निरारम्भस्य सेत्स्यति ||
१२ ख