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शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
कोशस्योपार्जनरतिर्यमवैश्रवणोपमः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
कोशाक्षपटलं यस्य कोशवृद्धिकरैर्जनैः |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
कोशात्समुद्ववर्हाशु विलाद्दीप्तमिवोरगम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
कोशाद्धर्मश्च कामश्च परो लोकस्तथाप्ययम् ||
४९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १३१
भीष्म उवाच
कोशाद्धि धर्मः कौन्तेय़ राज्यमूलः प्रवर्तते ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
कोशे जनपदे दण्डे न स राज्येऽवतिष्ठते ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
कोशेन पौरैर्दण्डेन ये चान्ये प्रिय़कारिणः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
कोशेश्वरस्य तीर्थेषु स्नात्वा भरतसत्तम |
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
कोशो मित्राणि धान्यं च सर्वोपकरणानि च ||
४५ ख
सभा पर्व
अध्याय ५४
युधिष्ठिर उवाच
कोशो हिरण्यमक्षय़्यं जातरूपमनेकशः |
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
कोशय़न्त्राय़ुधं चैव ये च वैद्याश्चिकित्सकाः ||
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
कोष्टकीकृत्य चाप्येनं परिक्षिप्य च सर्वशः |
८३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
कोष्ठकीकृत्य कौन्तेय़ं सम्प्रहृष्टमय़ोधय़न् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
कोष्ठकीकृत्य तं वीरं धार्तराष्ट्रा महारथाः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ११९
भीष्म उवाच
कोष्ठागारं च ते नित्यं स्फीतं धान्यैः सुसञ्चितम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
कोष्ठागारमसंहार्यैराप्तैः सञ्चय़तत्परैः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
कोसलाः काशय़ोऽङ्गाश्च कलिङ्गा मगधास्तथा ||
६० ख
सभा पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
कोसलाधिपतिं चैव वृहद्वलमरिन्दमः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
कोसलाधिपतेः पुत्रं सुक्षत्रं वाजिनोऽवहन् ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
कोसलानां तथा राजन्नाराय़णवलस्य च ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
कोसलानामधिपतिं राजपुत्रं वृहद्वलम् |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
कोसलानामधिपतिर्हत्वा वहुशतान्परान् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
कोसलानामाधिपत्यं सम्प्राप्ते क्षेमदर्शिनि |
६ क
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
कोसलेन्द्रमथाभ्येत्य सर्वमावेद्य चाङ्गदः |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
कोसलैः काशिमत्स्यैश्च कारूषैः केकय़ैरपि |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
कर्ण उवाच
कोऽद्य भीतं न मां विद्यात्पार्थानां समितिं गतम् ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
कोऽन्य एवं यथा हि त्वं जरासन्ध वृथामतिः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
वैशम्पाय़न उवाच
कोऽन्यः प्रतिसमासेत कालान्तकय़मादृते ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
आप ऊचुः
कोऽन्यः प्रसादो हि भवेद्यः कृच्छ्रान्नः समुद्धरेत् ||
५१ ख
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
कोऽन्यः शक्तो रणे जेतुमृते पार्थं युधिष्ठिरम् |
२७ क
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
कोऽन्यः समर्थः पार्थस्य वेगं धारय़ितुं रणे ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
कोऽन्यः स्थास्यति सङ्ग्रामे भीतो भीते व्यपाश्रय़े ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भृगुरु उवाच
कोऽन्यस्तद्वेदितुं शक्तो योऽपि स्यात्तद्विधोऽपरः ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
कोऽन्यस्तमुत्सहेज्जेतुमुद्यतेषुं महीपतिम् |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
गरुड उवाच
कोऽन्यो भारसहो ह्यस्ति कोऽन्योऽस्ति वलवत्तरः |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ६३
युधिष्ठिर उवाच
कोऽन्यो वृहन्नडाय़ास्तान्प्रतिय़ुध्येत सङ्गतान् ||
४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८९
युधिष्ठिर उवाच
कोऽन्यो हि पृथिवीं कृत्स्नामवजित्य सपार्थिवाम् |
१८ क
स्त्री पर्व
अध्याय १
धृतराष्ट्र उवाच
कोऽन्योऽस्ति दुःखिततरो मय़ा लोके पुमानिह ||
१९ ग
आदि पर्व
अध्याय २७
शौनक उवाच
कोऽपराधो महेन्द्रस्य कः प्रमादश्च सूतज |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
कोऽर्जुनस्याग्रतस्तिष्ठेत्साक्षादपि शतक्रतुः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
कोऽर्जुनस्याग्रतस्तिष्ठेदपि मृत्युर्जरातिगः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
कोऽसि कं त्वाभिजानीमो वय़ं किं करवामहे ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
जनमेजय़ उवाच
कोऽसौ नकुलरूपेण शिरसा काञ्चनेन वै |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
कोऽसौ हि कस्य वा नादो येन विह्वलितं जगत् ||
२७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
कोऽस्माकं जीवितेनार्थस्तद्धि नो व्राह्मणाश्रय़म् ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
कोऽय़ं दुर्योधनो नाम कुलेऽस्मिन्कुलपांसनः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय ५२
वृहदश्व उवाच
कोऽय़ं देवो नु यक्षो नु गन्धर्वो नु भविष्यति ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
कोऽय़ं देवो भवेत्साक्षाद्रुद्रो यक्षः सुरेश्वरः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
युधिष्ठिर उवाच
कोऽय़ं धर्मः कुतो धर्मस्तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
कोऽय़ं पितरमस्माकं नाम्नाहेत्यूचतुश्च तौ ||
१८ ख