द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
कौलूतका हय़ाश्चित्रा वहन्तस्तान्महारथान् |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
कौवेरं प्रय़यौ तीर्थं तत्र तप्त्वा महत्तपः |
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
कौवेरं वारुणं चैव याम्यं वाय़व्यमेव च |
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
कौवेरमपि जग्राह दिव्यमस्त्रं महावलः ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
कौशन्ते च कुशस्तम्वे द्रोणशर्मपदे तथा |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
कौशिकं चित्रसेनं च तस्मिन्युद्ध उपस्थिते ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
युधिष्ठिर उवाच
कौशिकाच्च कथं वंशात्क्षत्राद्वै व्राह्मणोऽभवत् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
कौशिकानि च वस्त्राणि शुभान्याभरणानि च |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
कौशिकी यमुना सीता तथा चर्मण्वती नदी |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
कौशिकीं तत्र सेवेत महापातकनाशिनीम् |
११३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
कौशिकीं त्रिदिवां कृत्यां विचित्रां लोहतारिणीम् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
कौशिकीं निम्नगां शोणां वाहुदामथ चन्दनाम् ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
कौशिकीकच्छनिलय़ं राजानं च महौजसम् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
कौशिकीति शिवा पुण्या व्रह्मर्षिगणसेविता ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
कौशिकीद्वारमासाद्य वाय़ुभक्षस्त्वलोलुपः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
गालव उवाच
कौशिकेनाभ्यनुज्ञातं पुत्रं वेदविभूषितम् |
३९ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
कौशिको मणिमांश्चैव ववृधाते ह्यनुग्रहम् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
कौशिकोऽप्यभवद्विप्रस्तपस्वी न वहुश्रुतः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
कौशिक्याः सङ्गमे यस्तु दृषद्वत्याश्च भारत |
८० क
वन पर्व
अध्याय
२७९
मार्कण्डेय़ उवाच
कौश्यां वृस्यां समासीनं चक्षुर्हीनं नृपं तदा ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
कौश्यां वृस्यां समासीनं जपमानं महाव्रतम् |
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१११
ऋश्यशृङ्ग उवाच
कौश्यां वृस्यामास्स्व यथोपजोषं; कृष्णाजिनेनावृताय़ां सुखाय़ाम् |
१० क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
कौसल्यं द्रौपदेय़ांश्च शकुनिं चापि सौवलम् |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
कौसल्यस्य पुनश्चापि धनुश्चिच्छेद फाल्गुणिः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
११०
वैशम्पाय़न उवाच
कौसल्या विदुरः क्षत्ता राजा च सह वन्धुभिः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
कौसल्यां च सुमित्रां च कैकेय़ीं च सुदुःखितः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
कौसल्यामातरित्येवमाभाष्य मधुरं वचः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
कौसल्यामातरिष्टांस्ते वरानद्य ददानि कान् ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
कौसल्ये देवरस्तेऽस्ति सोऽद्य त्वानुप्रवेक्ष्यति |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
कौसल्ये धर्मतन्त्रं यद्व्रवीमि त्वां निवोध मे |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
कौसल्येनैवमुक्तस्तु राजपुत्रेण धीमता |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
कौस्तुभं मणिमामुच्य श्रिय़ा परमय़ा ज्वलन् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
कौस्तुभश्च मणिर्दिव्य उत्पन्नोऽमृतसम्भवः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
कौस्तुभेन उरःस्थेन मणिनाभिविराजितम् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
क्रकराञ्शारिकाश्चैव शुकांश्चाशुभवादिनः ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
क्रतवश्च भविष्यन्ति भूय़ांसो भूरिदक्षिणाः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
क्रतवश्च यथासोमास्तथा गङ्गां विना जगत् ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२०
नारद उवाच
क्रतवो वाजपेय़ाश्च तेषां फलमवाप्नुहि ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
क्रतावुपहितं न्यस्तं हविः श्वेव दुरात्मवान् ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
क्रतुं समाप्य स्वगृहं तं कालं सोऽभ्यरक्षत ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
क्रतुना चाश्वमेधेन पूय़ते नात्र संशय़ः |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
क्रतुभिर्दक्षिणावद्भिरन्नपर्वतशोभितैः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
क्रतुभिश्चोपवासैश्च त्रिदिवं याति भारत |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१७७
सर्प उवाच
क्रतुभिस्तपसा चैव स्वाध्याय़ेन दमेन च |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
क्रतुमेनं समाहृत्य पूताः सर्वे दिवं गताः ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
क्रतुर्हरः प्रचेताश्च मनुर्दक्षस्तथैव च |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
क्रतुवधप्राप्तमन्युना च दक्षेण भूय़स्तपसा चात्मानं संय़ोज्य नेत्राकृतिरन्या ललाटे रुद्रस्योत्पादिता ||
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२०
नारद उवाच
क्रतुष्वनुपय़ुक्तानि तेन सत्येन खं व्रज ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
क्रतुस्थला घृताची च विश्वाची पूर्वचित्त्यपि |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
क्रतूनाहृत्य महतो महिमानं स गच्छति ||
३१ ख