वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
क्रतून्सर्वानवाप्नोति व्रह्मलोकं च गच्छति ||
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
क्रतोः क्रतुसमाः पुत्राः पतङ्गसहचारिणः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
क्रथनेन च शूरेण तपनेन च खेचरः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
क्रन्दन्तः समदृश्यन्त तृषिता जीवितेप्सवः ||
३७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
क्रमं प्रणीय़ शिक्षां च प्रणय़ित्वा स गालवः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
क्रमणाच्चाप्यहं पार्थ विष्णुरित्यभिसञ्ज्ञितः ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
क्रमप्राप्तं पितुः स्वं यो राज्यं समनुशास्ति ह ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
क्रममाणस्य ते रूपं दृश्यते पन्नगाशन |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
क्रमशः पार्थिवं यच्च वाय़व्यं खं तथा पय़ः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
क्रमशः संश्रय़िष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ||
८३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
क्रमशः सञ्चितशिखो धर्मवुद्धिमय़ो महान् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
क्रमशस्तु शनैर्गच्छेत्सर्वं तत्परिभावनम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
भीष्म उवाच
क्रमशस्त्ववधूय़ैनां तृतीय़ां वृत्तिमुत्तमाम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
क्रमागतं राज्यमिदं परेषां; हर्तुं कथं शक्ष्यसि दुर्विनीतः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
क्रमेण गच्छन्परिपूर्णकामः; शूर्पारकं पुण्यतमं ददर्श ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
क्रमेण च पुनः सर्वे दिवसानि वहून्यपि |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
क्रमेण चानेन नराधिपात्मजा; वरस्त्रिय़ास्ते जगृहुस्तदा करम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
क्रमेण चास्य ते पुत्रा व्यवर्धन्त महौजसः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
क्रमेण ते त्रय़ोऽप्युक्ताः पितरो धर्मनिश्चय़े ||
१३ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
क्रमेण ते यय़ुर्वीरा लौहित्यं सलिलार्णवम् ||
३१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
क्रमेण परिसर्पन्तं वल्लीवृक्षसमावृतम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
क्रमेण पृथिवीपाल नैमिषारण्यमागताः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
क्रमेण मृदुना युद्धमुपक्रामन्त भारत ||
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
क्रमेण युगपद्द्वन्द्वं व्यसनानां वलावलम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
क्रमेण येन यस्मिंश्च काले यच्च यथा च तत् ||
७५ ख
सभा पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
क्रमेण राजन्दिव्यास्ताः श्रूय़न्तामिह नः सभाः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
क्रमेण वर्धितौ चापि विद्यासु कुशलावुभौ ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
क्रमेण व्यचरत्स्फीतं ततः पञ्चनदं यय़ौ ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
क्रमेण स हय़स्त्वेवं विचरन्भरतर्षभ |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
क्रमेण सञ्चितो धर्मो वुद्धिय़ोगमय़ो महान् |
६८ क
आदि पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
क्रमेण सर्वे विविशुश्च तत्सदो; महर्षभा गोष्ठमिवाभिनन्दिनः ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
क्रमेणानेन मोक्षः स्याच्छरीरमपि केवलम् ||
१९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
क्रमेणास्य प्रलुम्पन्ति रूपमाय़ुस्तथैव च ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
क्रमेणैव व्यतिक्रम्य भारतं वर्षमासदत् ||
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
क्रमेणोत्तीर्य यमुनां नदीं परमपावनीम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
भीम उवाच
क्रमेय़ं त्वां गिरिं चेमं हनूमानिव सागरम् ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
क्रमय़ुक्तं च युक्तं च चक्रुस्तत्र द्विजर्षभाः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
क्रमय़ोगं तमप्याहुर्वाक्यं वाक्यविदो जनाः ||
८३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
क्रव्यादगणसङ्कीर्णा घोराभूत्पृथिवी विभो ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
क्रव्यादगणसङ्घुष्टां श्वशृगालगणाय़ुताम् |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
क्रव्यादसङ्घसङ्कीर्णा यमराष्ट्रविवर्धिनी ||
३६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१९
गान्धार्यु उवाच
क्रव्यादसङ्घैः सहिता रुदन्त्यः पर्युपासते ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
क्रव्यादसङ्घैराकीर्णं मृतैरर्धमृतैरपि |
१८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
क्रव्यादसङ्घैर्मुदितैस्तिष्ठद्भिः सहितैः क्वचित् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
क्रव्यादा अपि राजेन्द्र कृतघ्नं नोपभुञ्जते ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
क्रव्यादा दन्दशूकाश्च कृमिकीटविहङ्गमाः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
क्रव्यादा भक्षय़िष्यन्ति मांसानि गजवाजिनाम् ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
क्रव्यादा व्याहरन्त्येते मृगाः कुर्वन्ति भैरवम् ||
४० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
क्रव्यादांस्तर्पय़िष्यामि द्रावय़िष्यामि शात्रवान् |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
क्रव्यादाः पक्षिणः सर्वे चतुष्पादाश्च दंष्ट्रिणः |
१९ क