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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
क्रिय़माणैर्न कम्पेत युक्तस्यैतन्निदर्शनम् ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
श्रीवासुदेव उवाच
क्रिय़या योगमास्थाय़ तथा त्वमपि विक्रम ||
१० ग
उद्योग पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
क्रिय़याहं वरारोहे वञ्चितः पुत्रधर्मतः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७६
अर्जुन उवाच
क्रिय़ा कथं नु मुख्या स्यान्मृदुना वेतरेण वा ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१३
भीष्म उवाच
क्रिय़ा तपश्च वेदाश्च दमे सर्वं प्रतिष्ठितम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
क्रिय़ा भवति केषाञ्चिदुपांशुव्रतमुत्तमम् |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
श्रीवासुदेव उवाच
क्रिय़ा वलवती राजन्नान्यत्किञ्चिद्युधिष्ठिर ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
क्रिय़ा स्यादा समावृत्तेराचार्ये वेदपारगे ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
क्रिय़ा हि धर्मस्य सदैव शोभना; यदा नरो मृत्युमुखेऽभिवर्तते ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
क्रिय़ा ह्येवं न हीय़न्ते पितृदैवतसंश्रिताः |
५७ क
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
क्रिय़ां कुर्वन्तु ते राजन्यथाशास्त्रमरिन्दम ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
क्रिय़ाः सर्वाः प्रवर्तन्ते पर्वतेभ्य इवापगाः ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४५
व्रह्मो उवाच
क्रिय़ाकारणसंय़ुक्तं रागविस्तारमाय़तम् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
क्रिय़ाकारणय़ुक्ताः स्युरनित्या मोहसञ्ज्ञिताः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
कर्ण उवाच
क्रिय़ाकाले त्वनुक्रोशमकृत्वा त्वमिमं मम |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
क्रिय़ाक्रिय़ा पथे रक्तस्त्रिगुणस्त्रिगुणातिगः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
क्रिय़ाक्रिय़ापथोपेतस्तथा तदिति मन्यते ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
क्रिय़ागुणानां सर्वेषामिदमाख्यानमाश्रय़ः |
२३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
क्रिय़ाभिः स्नेहसम्वन्धः स्नेहाच्छोकमनन्तरम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
क्रिय़ाभिरनुगृह्यन्तां सह मात्रा परन्तपाः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
भीष्म उवाच
क्रिय़ाभिरामा मनुजा यशस्विनो; वभुः शुभे पुण्यकृतां पथि स्थिताः |
९१ क
आदि पर्व
अध्याय २२०
देवा ऊचुः
क्रिय़ाभिर्व्रह्मचर्येण प्रजय़ा च न संशय़ः ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
श्रीवासुदेव उवाच
क्रिय़ाभ्युपाय़ैः पूर्वं हि हिरण्याक्षो महासुरः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
श्रीवासुदेव उवाच
क्रिय़ाभ्युपाय़ैरिन्द्रेण त्रिदिवं भुज्यते विभो |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
श्रीवासुदेव उवाच
क्रिय़ाभ्युपाय़ैरिन्द्रेण निहता दैत्यदानवाः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
श्रीवासुदेव उवाच
क्रिय़ाभ्युपाय़ैर्निहताः क्रिय़ां तस्मात्समाचर ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
श्रीवासुदेव उवाच
क्रिय़ाभ्युपाय़ैर्निहतो मय़ा राजन्पुरातने |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
श्रीवासुदेव उवाच
क्रिय़ाभ्युपाय़ैर्वहुभिर्वलिर्वद्धो महात्मना ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
श्रीवासुदेव उवाच
क्रिय़ाभ्युपाय़ैर्वहुलैर्माय़ामप्सु प्रय़ोज्य ह |
७ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
क्रिय़ामन्त्रविहीनोऽपि तत्र स्नात्वा नरर्षभ |
१३५ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
क्रिय़ामन्त्रैश्च संय़ुक्तो व्राह्मणः स्यान्न संशय़ः ||
१३४ ख
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
क्रिय़ामेतां समाज्ञाय़ कृतघ्नो न भविष्यसि |
८ क
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
क्रिय़ारतिर्धर्मपरः सततं वृद्धसेविता ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
क्रिय़ालोपे तु नृपतेः कुतः स्वर्गः कुतो यशः ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
क्रिय़ावद्भिर्हि कौन्तेय़ देवलोकः समावृतः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
क्रिय़ावाञ्श्रद्दधानश्च दाता प्राज्ञोऽनसूय़कः |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
क्रिय़ाविशेषं कृतिनौ दर्शय़ामासतुस्तदा ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
क्रिय़ाविशेषवहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
क्रिय़ाव्युपरमात्तेषां ततोऽगच्छाम संशय़म् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २७७
मार्कण्डेय़ उवाच
क्रिय़ाश्च तस्या मुदितश्चक्रे स नृपतिस्तदा ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
क्रिय़ासु निरता नित्यं दाने यज्ञे च कर्मणि ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
क्रिय़ास्वपि च सर्वासु विशेषानभ्यशिक्षय़त् ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
जनमेजय़ उवाच
क्रिय़ास्वभ्युदय़ोक्तासु सक्ता दृश्यन्ति सर्वशः |
५ ख
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
क्रिय़ेत कस्मान्न परे च कुर्यु; र्वित्तं न दद्युः पुरुषाः कथञ्चित् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
क्रीडतः क्रीडनीय़ानि ददुः पक्षिगणांश्च ह ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
क्रीडता हि मय़ा वाल्ये वासुदेव महामनाः |
८६ क
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
क्रीडते भगवन्भूतैर्वालः क्रीडनकैरिव ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
क्रीडते सूत्रवद्धेन पक्षिणा वालको यथा ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
क्रीडतो भोजराजन्यानेष रैवतके गिरौ |
८ क
वन पर्व
अध्याय ११६
अकृतव्रण उवाच
क्रीडन्तं सलिले दृष्ट्वा सभार्यं पद्ममालिनम् |
७ क