chevron_left  क्रीडन्तमष्टादशभिःarrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
क्रीडन्तमष्टादशभिः पृषत्कै; र्विव्याध वीरं स चुकोप विद्धः ||
२७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १९
गान्धार्यु उवाच
क्रीडन्तमिव गन्धर्वं देवकन्याः सहस्रशः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
क्रीडन्ति सर्पैर्नकुला मृगैर्व्याघ्राश्च मित्रवत् |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
क्रीडन्तीनां तु कन्यानां वने चैत्ररथोपमे |
४ क
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
क्रीडन्तो वीटय़ा तत्र वीराः पर्यचरन्मुदा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
क्रीडन्त्यश्च हसन्त्यश्च गाय़न्त्यश्चैव ताः शुकम् |
४० क
आदि पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
क्रीडन्त्योऽभिरताः सर्वाः पिवन्त्यो मधुमाधवीम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
क्रीडन्त्योऽभिसमाय़ान्ति पार्थं संनद्धमीक्षितुम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
क्रीडन्निव तदा देवैरभिषिक्तः स पावकिः ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय २१४
मार्कण्डेय़ उवाच
क्रीडन्भाति महासेनस्त्रीँल्लोकान्वदनैः पिवन् |
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
क्रीडन्स्त्रीभिर्निरातङ्कः प्रशाम्य भरतर्षभ ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
क्रीडमानान्सुविश्रव्धान्विस्मिता चेदमव्रवीत् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
क्रीडमानौ रथोदारौ चित्ररूपौ व्यरोचताम् |
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
गरुड उवाच
क्रीडसे कामकारेण देवराज यथेच्छकम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
क्रीडानिमित्तानि च यानि तानि; सर्वाणि तत्रोपजहार राजा ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
क्रीडाप्रदेशांश्च समृद्धरूपा; न्सुचित्रमाल्यावृतजातशोभान् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
क्रीडाभिर्विमलाभिश्च क्रीडन्ति विमलाननाः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
क्रीडारतिविहारेषु परां मुदमवाप्नुवन् ||
६७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
क्रीडारथोऽस्तु भगवन्नुत साङ्ग्रामिको रथः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
क्रीडार्थं तु महाराज शतशोऽथ सहस्रशः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
क्रीडावसाने सर्वे ते शुचिवस्त्राः स्वलङ्कृताः |
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
क्रीडितुं तेन चेच्छन्ति ससूत्रेणेव पक्षिणा |
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
क्रीणन्तो वहु वाल्पेन कान्तारकृतनिश्रमाः ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय ५५
विदुर उवाच
क्रीणीष्व पाण्डवान्राजन्मा मज्जीः शोकसागरे ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ८८
वसुमना उवाच
क्रीणीष्वैनांस्तृणकेनापि राज; न्प्रतिग्रहस्ते यदि सम्यक्प्रदुष्टः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
क्रीणीय़ात्तं सहस्रेण नीतिमन्नाम तत्पदम् ||
५३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
क्रीत्वा वै प्रतिविक्रीणे परहस्तादमाय़या ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
क्रुद्धं तं तु पिता दृष्ट्वा श्वेतकेतुमुवाच ह |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धं तमुद्वीक्ष्य भय़ेन राज; न्संमूर्छितो नालभं शान्तिमद्य |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२
शल्य उवाच
क्रुद्धं तु नहुषं ज्ञात्वा देवाः सर्षिपुरोगमाः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धं तु पाण्डवं दृष्ट्वा देवगन्धर्वराक्षसाः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
क्रुद्धं तु शक्रं प्रसमीक्ष्य देवो; जहास शक्रं च शनैरुदैक्षत |
१६ क
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
क्रुद्धं संशमय़ामास जगृहे च स तद्वचः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
क्रुद्धः परुषय़ा वाचा श्रेय़सोऽप्यवमन्यते ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
क्रुद्धः पापं नरः कुर्यात्क्रुद्धो हन्याद्गुरूनपि |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धः प्रच्छादय़ामास शरजालेन मारुतिः ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
क्रुद्धः प्रातिष्ठतोत्थाय़ महानाग इव श्वसन् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धः प्रोवाच वै द्रोणं रक्तताम्रेक्षणः श्वसन् ||
८२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धः शरैश्छेत्स्यति चापमुक्तै; स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
क्रुद्धः शान्तनवो भीष्मस्तिष्ठ तिष्ठेत्यभाषत ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
क्रुद्धः स तु समासाद्य तावृषी भ्रातरौ तदा |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धः सर्वाय़सीं शक्तिं चिक्षेपाधिरथिं प्रति ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धमाधिरथिं दृष्ट्वा पुत्रास्तव विशां पते |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धश्च चापमाय़म्य वलवद्वलिनां वरः |
६८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धश्चाप्यहनत्पार्श्वे नाराचैर्मर्मभेदिभिः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
क्रुद्धश्चाभक्षय़त्तेषां शस्त्राणि विविधानि च ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धश्चिच्छेद भल्लेन धनुः शत्रुनिषूदनः ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धस्तु फल्गुनः सङ्ख्ये द्विगुणीकृतविक्रमः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
क्रुद्धस्य चेद्भीमसेनस्य वेगा; त्सुय़ोधनो मन्यते सिद्धमर्थम् ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
क्रुद्धस्य तस्य स्रोतोभ्यः कर्णादिभ्यो नराधिप |
१४ क