द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
क्रुद्धय़ोर्वाशिताहेतोर्वन्ययोर्गजय़ोरिव ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
क्रुध्यन्तमप्रतिक्रुध्यन्द्वय़ोरेष चिकित्सकः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
क्रुध्यन्ति परिदीप्यन्ति भूमिमध्यासतेऽस्य च |
५१ क
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
क्रुध्यन्तीं मां च सम्प्रेक्ष्य समशङ्कत मां त्वय़ि ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
क्रुध्येथा यदि मात्सर्यादिति तन्मर्षितं च ते ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
भीमसेन उवाच
क्रूर पापजनैर्जुष्टमकृतार्थं प्रभाषसे |
१६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
गान्धार्यु उवाच
क्रूरं कर्माकरोः कस्मात्तदय़ुक्तं वृकोदर ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६४
इन्द्र उवाच
क्रूरं कर्मास्त्रवित्तात करिष्यसि परन्तप |
२५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
क्रूरं मनस्ततः कृत्वा तावुभौ प्रत्यभाषत ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
क्रूरः सर्वविनाशाय़ कालः समतिवर्तते ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
क्रूरकर्मा ददच्छ्राद्धमार्द्राय़ां मानवो भवेत् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
क्रूरकर्माभिजातोऽसि यस्मादुद्विजते जनः ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
क्रूरपक्षिमृगं घोरं साय़ाह्ने भरतर्षभाः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
क्रूरमाय़ोधनं जज्ञे तस्मिन्राजसमागमे |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१४२
हिडिम्वो उवाच
क्रूरवुद्धेरहं तस्य वचनादागता इह |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
उत्तङ्क उवाच
क्रूरस्य स्वपतस्तस्य वालुकान्तर्हितस्य वै |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
क्रूरस्वभावं क्रूराय़ाः पुत्रपौत्रमनन्तकम् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
क्रूरां मतिं समास्थाय़ जग्मतुः सर्वतोमुखम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
क्रूरां शरीरसङ्घाटां सादिनक्रां दुरत्ययाम् |
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
क्रूरान्निकृतिसंय़ुक्तान्विहितानशमात्मकान् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
क्रूराय़ कर्मणे नित्यं प्रजानां परिपालने ||
७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
क्रूराय़ कर्मणे नित्यं प्रजानां परिपालने |
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
तक्षो उवाच
क्रूरेण नापत्रपसे कथं शक्रेह कर्मणा |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
क्रूरेषु कर्मसु कथं देहवाक्चित्तदूषिषु |
७६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
क्रूरो मानुषमांसादो महावीर्यो महावलः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
क्रूरो विशसनो घोरो राजन्दुर्मन्त्रिते तव ||
१२९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
क्रूरोऽमर्षी स दुष्टात्मा भुवि प्रख्यातविक्रमः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
क्रोडैः क्रोडानभिघ्नन्तो घोणाभिश्च परस्परम् |
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
क्रोधं कामस्य देवेशः सहाय़ं चासृजत्प्रभुः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
७१
भीष्म उवाच
क्रोधं कुर्यान्न चाकस्मान्मृदुः स्यान्नापकारिषु ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
क्रोधं त्यक्त्वा तु पुरुषः सम्यक्तेजोऽभिपद्यते |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९५
वामदेव उवाच
क्रोधं निय़न्तुं यो वेद तस्य द्वेष्टा न विद्यते ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
क्रोधं मुक्तं सैन्धवे चार्जुनेन; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
क्रोधं वलममर्षं च निय़म्यात्मजमात्मनि |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधं वलममर्षं च यो निधाय़ परन्तपः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
क्रोधं शमेन जय़ति कामं सङ्कल्पवर्जनात् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
क्रोधः कामो लोभमोहौ विवित्सा; कृपासूय़ा मानशोकौ स्पृहा च |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधः प्रजज्वाल जय़द्रथं च; दृष्ट्वा प्रिय़ां तस्य रथे स्थितां च ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
क्रोधः शत्रुः शरीरस्थो मनुष्याणां द्विजोत्तम |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
क्रोधः शोकस्तथा तृष्णा लोभः पैशुन्यमेव च |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
क्रोधः श्रिय़ं शीलमनार्यसेवा; ह्रिय़ं कामः सर्वमेवाभिमानः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
क्रोधः सुविपुलो व्रह्मन्प्रसादश्च महात्मनाम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
क्रोधजानि तथोग्राणि कामजानि तथैव च |
५९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
क्रोधताम्रेक्षणः कृष्णो जिघांसुरमितद्युतिः |
५५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधदीप्तं तु कौन्तेय़ं द्विषदर्थे समुद्यतम् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
क्रोधदीप्तवपुर्मेघैः सप्तसप्तिरिवांशुमान् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
क्रोधदीप्तेक्षणा क्रोधं भूय़ एव समादधे ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
क्रोधनस्त्वल्पविज्ञानः प्रेत्य चेह च नश्यति ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
क्रोधनाय़ नृशंसाय़ मृदवे वाहुशालिने ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
क्रोधपूर्वं तथा भीमः पूर्ववैरमनुस्मरन् ||
३८ ख