द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
क्रोधाद्भूरिश्रवा राजन्सहसा समुपाद्रवत् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९५
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधाद्यं पुरुषं पश्येस्त्वं वासवसमद्युते |
२० क
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
भीमसेन उवाच
क्रोधाद्यदव्रुवं चाहं तच्च मे हृदि वर्तते ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
क्रोधाद्यश्चाविशल्लोकांस्तस्माच्छर्व इति स्मृतः ||
८७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधाद्विस्फुरमाणोष्ठो विनिष्पिष्य करे करम् ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
क्रोधादय़ो द्वादश यस्य दोषा; स्तथा नृशंसादि षडत्र राजन् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
क्रोधामर्षवलोद्धूतो निवातकवचान्तकः |
१६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
क्रोधामर्षवशं प्राप्तो द्रोणपुत्रस्तु भारत |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधामर्षाभितप्ताङ्गस्ततो वै द्विजपुङ्गवः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
क्रोधाल्लोभान्मोहमय़ान्तरात्मा; स वै मृत्युस्त्वच्छरीरे य एषः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
क्रोधाविष्टस्य सञ्जज्ञे रुद्रः संहारकारकः ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
६४
कर्ण उवाच
क्रोधाविष्टेषु पार्थेषु धार्तराष्ट्रेषु चाप्यति |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधाविष्टो विनिःश्वस्य पुनश्चैनं वृकोदरः |
५७ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
क्रोधावेशः प्रसादश्च गान्धारीधृतराष्ट्रय़ोः ||
१९१ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
क्रोधितस्तु रणे पार्थो नाराचं कालसंमितम् |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
धृतराष्ट्र उवाच
क्रोधितो मम पुत्रेण दुःखितेन विशेषतः ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
क्रोधेन निःश्वसन्वीरः पार्षतं समुपाद्रवत् |
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
क्रोधेन महताविष्टः पुत्रस्तव विशां पते ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
क्रोधेन महताविष्टः सविषो भुजगो यथा |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधेन महताविष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
क्रोधेन महताविष्टो निर्विण्णोऽभूत्स जीवितात् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
क्रोधेन महताविष्टो वाय़व्यास्त्रमवासृजत् ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
क्रोधेन महताविष्टो व्यावृत्य नय़ने शुभे ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
क्रोधेनाभिप्रजज्वाल दिधक्षन्निव पावकः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
क्रोधेनाभिप्रजज्वाल भैमसेनिर्महावलः ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
क्रोधो दानफलं हन्ति लोभात्स्वर्गं न गच्छति |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
क्रोधो भेदो भय़ो दण्डः कर्शनं निग्रहो वधः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
क्रोधो लोभस्तथा मोहः सत्त्ववान्मुक्त एव सः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
क्रोधो वलं तथा वीर्यं ज्ञानय़ोगोऽस्त्रलाघवम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधो विचित्यः सुरसः श्रीमान्नीलश्च भूमिपः |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
क्रोधो हन्ता मनुष्याणां क्रोधो भावय़िता पुनः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
क्रोधो हन्ति हि यद्दानं तस्माद्दानात्परो दमः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीस्तम्भो मान्यमानिता |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
३८
शमीक उवाच
क्रोधो हि धर्मं हरति यतीनां दुःखसञ्चितम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
क्रोध्यमानः प्रिय़ं व्रूय़ादाक्रुष्टः कुशलं वदेत् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
क्रोशतस्तव पुत्रस्य न स्म राजन्न्यवर्तत ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोशतस्तव राजेन्द्र ससैन्यस्य नृपात्मज ||
६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
क्रोशतस्तीरमासाद्य यथा सर्वे जलेचराः ||
२६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
क्रोशतां किमिदं कोऽय़ं किं शव्दः किं नु किं कृतम् |
७३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
क्रोशतां गर्जतां चैव तदासीत्तुमुलं महत् ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
क्रोशतां चापि योधानां त्वरितानां परस्परम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
क्रोशतां भूमिपालानां युज्यतां युज्यतामिति ||
२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
अश्वत्थामो उवाच
क्रोशतां भूमिपालानां युय़ुधानेन पातितः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
क्रोशतां यतमानानामसंसक्तौ परन्तपौ |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
क्रोशतां वै भृशं दुःखं विवत्सानां गवामिव ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
शौनक उवाच
क्रोशतां सर्वभूतानामहो धिगिति कुर्वताम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
क्रोशतां सर्वसैन्यानां निन्द्यमानः सुदुर्मनाः ||
३३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोशतां सादिनां तत्र युज्यतां युज्यतामिति ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोशतो धृतराष्ट्रस्य वद्ध्वा योत्स्यामहे रिपून् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोशतो न च गृह्णीते वचनं मे सुय़ोधनः ||
२ ख