शान्ति पर्व
अध्याय
६४
इन्द्र उवाच
शिष्टाश्चान्ये सर्वधर्मोपपन्नाः; साध्वाचाराः साधु धर्मं चरन्ति ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
शिष्टाश्रय़ाममृतां व्रह्मकान्तां; गङ्गां श्रय़ेदात्मवान्सिद्धिकामः ||
९४ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
शकुनिरु उवाच
शिष्टे सति धने राजन्पाप आत्मपराजय़ः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
शिष्टैराचरितं धर्मं कृष्णे मा स्मातिशङ्किथाः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
शिष्टैश्च धर्मो यः प्रोक्तः स च मे हृदि वर्तते |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
शिष्टो न शिष्टवत्स स्याद्व्राह्मणो व्रह्मवित्कविः ||
२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
शिष्टो युधिष्ठिरोऽस्माभिः शास्ता सन्नपि पाण्डवः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
कापव्य उवाच
शिष्ट्यर्थं विहितो दण्डो न वधार्थं विनिश्चय़ः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं समाहितम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षय़ा ||
११ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
शिष्यं परिक्षितं तस्मै ददौ भरतसत्तमः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
शिष्यः कृत्स्नं धनुर्वेदं चतुष्पादमवाप्तवान् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
वासुदेव उवाच
शिष्यः पप्रच्छ मेधावी किं स्विच्छ्रेय़ः परन्तप ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
भीष्म उवाच
शिष्यः परममेधावी श्रेय़ोर्थी सुसमाहितः |
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
शिष्यत्वं वा पुरस्कृत्य मम वा मन्दभाग्यताम् ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
शिष्यत्वमुपगच्छध्वं विधिवद्भो ममेत्युत ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
शिष्यध्रुङ्निहतः पापो युध्यस्व विजय़स्तव ||
३९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
शिष्यभूतेन राजाय़ं गुरुवत्पर्युपासितः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
शिष्यमध्यगतं शान्तं युवानं व्राह्मणर्षभम् |
४५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
शिष्ययोः कौशलं युद्धे पश्य रामेति चाव्रुवन् ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
शिष्ययोर्वै गदाय़ुद्धं द्रष्टुकामोऽस्मि माधव ||
५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
५
वासुदेव उवाच
शिष्यवत्ते वय़ं सर्वे भवामेह न संशय़ः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
शिष्यवत्परिचर्याथ शान्तः प्रकृतिमागतः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२८९
वैशम्पाय़न उवाच
शिष्यवत्पुत्रवच्चैव स्वसृवच्च सुसंय़ता ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
शिष्यवृत्तौ स्थितान्नित्यं गुरुवत्पर्यपश्यत ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
शिष्यस्ते शासिता सोऽस्तु धृतराष्ट्र युधिष्ठिरः ||
८१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
शिष्यस्नेहेन भगवन्स मां रक्षितुमर्हसि |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
७४
देवय़ान्यु उवाच
शिष्यस्याशिष्यवृत्तेर्हि न क्षन्तव्यं वुभूषता |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
शिष्या इति ददौ राजन्द्रोणाय़ विधिपूर्वकम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
शिष्या इव महात्मानमिन्द्रिय़ाणि च तं विभो ||
९० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४७
नागभार्यो उवाच
शिष्याणां गुरुशुश्रूषा विप्राणां वेदपारणम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
शिष्याणां वचनं श्रुत्वा पराशरसुतः प्रभुः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
शिष्याणां वचनं श्रुत्वा व्यासो वेदार्थतत्त्ववित् |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
शिष्याणां वचनं श्रुत्वा सर्वाज्ञानतमोनुदः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
शिष्याणामखिलं कृत्स्नमनुज्ञातं ससङ्ग्रहम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
शिष्यानुप्रहितास्तस्मिन्नकुर्वन्गुरवश्च ह ||
७४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
शिष्यार्थं प्रददौ चापि द्रोणाय़ कुरुपुङ्गव |
५६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
वासुदेव उवाच
शिष्याय़ गुणय़ुक्ताय़ शान्ताय़ गुरुवर्तिने |
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
भीष्म उवाच
शिष्यैः परिवृतो राजञ्जटाचीरधरो मुनिः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
शिष्यैरनुगताः सर्वे देवकल्पैस्तपोधनैः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
शिष्यो मम सखा चैव प्रिय़ोऽस्याहं प्रिय़श्च मे |
५७ क
आदि पर्व
अध्याय
१३
सूत उवाच
शिष्यो व्यासस्य मेधावी व्राह्मणैरिदमुक्तवान् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
शिष्योपाध्याय़िका वृत्तिर्यत्र स्यात्सुसमाहिता |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
शीघ्रं गच्छ महावाहो पाण्डवान्परिपालय़ |
७० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
शीघ्रं गच्छत भद्रं वो राधेय़ं परिरक्षत |
५ क
वन पर्व
अध्याय
३९
महेश्वर उवाच
शीघ्रं गच्छत संहृष्टा यथागतमतन्द्रिताः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
शीघ्रं गच्छाम भद्रं ते न नो विद्यात्सुय़ोधनः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
शीघ्रं धारय़ चौरस्य मम दण्डं नराधिप ||
१० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
शीघ्रं न्यस्यत शस्त्राणि वाहेभ्यश्चावरोहत |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
शीघ्रं प्रजवितैरश्वैः प्रत्युद्याहि प्रहृष्टवत् |
१० क