वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
क्व सा पुण्यजला रम्या नानाद्विजनिषेविता |
९४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
क्व सा वुद्धिरिय़ं चाद्य भवत्या या श्रुता मय़ा |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
क्व सा साध्वी क्व सा याता गरीय़ः किमतो मम ||
६१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
क्वचिच्च वीरपत्नीभिर्हतवीराभिराकुलम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
क्वचिच्चोरैः क्वचिच्छस्त्रैः क्वचिद्राजभिरातुरैः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
क्वचिच्छन्देन गच्छन्तस्ते जग्मुः प्रसभं पुनः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
क्वचिज्जगाम पद्भ्यां तु राक्षसैरुह्यते क्वचित् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
क्वचित्कनकसङ्काशं क्वचिद्रजतसंनिभम् |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
क्वचित्क्वचिच्छ्रमात्स्थाता कुरुते वासमेव वा ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
क्वचित्क्वचिद्व्रतपरो व्रतान्यास्थाय़ पार्थिव ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१०८
लोमश उवाच
क्वचित्सा तोय़निनदैर्नदन्ती नादमुत्तमम् ||
११ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
क्वचित्सुवर्णवर्णाभो वैडूर्यसदृशः क्वचित् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
क्वचिदञ्जनपुञ्जाभं हिमवन्तमुपागमत् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
क्वचिदञ्जनवर्णाभाः क्वचित्काञ्चनसंनिभाः |
८० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
क्वचिदप्सरसां सङ्घान्गन्धर्वाणां च पार्थिव ||
१२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
क्वचिदाक्रीडमानैश्च शय़ानैरपरैः क्वचित् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१०८
लोमश उवाच
क्वचिदाभोगकुटिला प्रस्खलन्ती क्वचित्क्वचित् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
क्वचिद्यास्यामि कौरव्य सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
क्वचिद्वर्षति पर्जन्यः क्वचित्सस्यं प्ररोहति ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
क्वचिद्वहन्तो जननीं त्वरमाणा महारथाः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
क्वचिन्निविशते वुद्धिस्तत्र जीर्यति वृक्षवत् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
युधिष्ठिर उवाच
क्वसमुत्थाः कथंशीला ऋत्विजः स्युः पितामह |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
क्वस्थस्तत्समुपाश्नाति सुकृतं यदि वेतरत् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
जनमेजय़ उवाच
क्वस्था वीराः पाण्डवास्ते वभूवुः; कुतश्चैतच्छ्रुतवन्तः प्रिय़ं ते |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
क्वार्जुनः क्व च गोविन्दः क्व च मानी वृकोदरः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
क्वासं क्वास्मि गमिष्यामि को न्वहं किमिहास्थितः |
४० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
क्वासाविति ततो राजन्दुःशला वाक्यमव्रवीत् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
क्वासि पार्थ न पश्ये त्वां कच्चिज्जीवसि शत्रुहन् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
क्वासौ क्वासाविति पुनस्तत्र तत्र विधावति |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
क्वासौ वन्दी यावदेनं समेत्य; नक्षत्राणीव सविता नाशय़ामि ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
क्वास्य ग्रीवा क्व चरणौ क्व पाणी क्व शिरस्तथा |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
क्वास्वौ क्वासाविति प्राह गृहीत्वा परमाय़ुधम् |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
क्वाय़ुधानि समासज्य प्रवेक्ष्यामः पुरं वय़म् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणं कुरुध्वं विपुलमाख्यातव्यं भविष्यति ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणं च कुरु राजेन्द्र सर्वं वक्ष्याम्यशेषतः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
क्षणः क्रिय़तामिति ||
१२३ 5
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
क्षणा लवा मुहूर्ताश्च दिवा रात्रिस्तथैव च |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
क्षणा लवा मुहूर्ताश्च निमेषा युगपर्ययाः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणात्प्रांशुः क्षणाद्ध्रस्वः क्षणाच्च रथधूर्गतः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षणान्निर्दानवं सर्वमकार्षुर्भृशहर्षिताः ||
६९ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणे तस्मिन्स तेनासीच्चैत्ययूप इवोच्छ्रितः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणेन क्षीणवाणोऽथ संवृत्तः फल्गुनस्तदा |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
क्षणेन खं दिशश्चैव शव्देनापूरितं तदा ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणेन चान्नपानानि गुणवन्ति समार्जय़न् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणेन चाभवद्व्योम सम्प्रशान्तरजस्तमः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
९५
लोपामुद्रो उवाच
क्षणेन जीवलोके यद्वसु किञ्चन विद्यते ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
क्षणेन तद्वनं चैव ते चैवाप्सरसां गणाः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणेन तद्वनं सर्वं निःशव्दमभवत्तदा |
६ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणेन तस्य ते राजन्क्षय़ं जग्मुरजिह्मगाः |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
क्षणेन तानवाप्नोति प्रजा धर्मेण पालय़न् ||
३० ख