द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
क्षणेन तुमुलो घोरः सङ्ग्रामः समवर्तत ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
क्षणेन तेन दग्धः स हिमवानभवन्नगः |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
क्षणेन दृष्ट्वा तौ वीरौ मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
क्षणेन नकुलोलूकौ नैराश्यं जग्मतुस्तदा ||
११२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणेन पतितो भूमौ विललापाकुलेन्द्रिय़ः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
क्षणेन पुरुषव्याघ्रः प्रावर्तय़त निम्नगाम् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
क्षणेन पूरय़ामास सलिलेन वसुन्धराम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणेन प्रेक्षतां तेषां विशल्यः सोऽभवत्तदा |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
क्षणेन भूमिः सञ्जज्ञे संवृता भरतर्षभ ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
क्षणेन भूय़ोऽपश्याम सूर्यं मध्यन्दिने यथा |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
क्षणेन भेरीपणवप्रणादा; नन्तर्दधुः शङ्खमहास्वनाश्च ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणेन रथमध्यस्थः क्षणेनावापतन्महीम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षणेन राजशार्दूल पुरेव कपिलः प्रभुः |
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
क्षणेन विनशेत्सर्वं यदि राजा न पालय़ेत् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षणेन व्यद्रवत्सर्वं विमुखं चाप्यदृश्यत ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणेन व्यधमत्सर्वां चित्रसेनस्य वाहिनीम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षणेन स पुनर्भ्रष्टो निःश्वासादिव दर्पणे ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
क्षणेन स रथस्तस्य सध्वजः सहसारथिः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
क्षणेन स रथस्तस्य सहय़ः सहसारथिः |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
क्षणेन स रथस्तस्य सहय़ः सहसारथिः |
४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
क्षणेन सर्वान्सरथाश्वसूता; न्निनाय़ राजन्क्षय़मेकवीरः ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
क्षणेन सर्वे विहिताः प्रदीपा; व्यदीपय़ंश्च ध्वजिनीं तदाशु ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
क्षणेन हि दिशः खं च सर्वतोऽभिविदीपितम् ||
३४ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
क्षणेन हि विभर्त्यन्यदनिर्देश्यं वपुस्तथा ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षणेनातीन्द्रिय़ाण्येषां चक्षूंष्यासन्युधिष्ठिर ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणेनाद्य करिष्येऽहमिदं वनमकण्टकम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणेनान्तर्हिताः सर्वे चारणा गुह्यकैः सह ||
३२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणेनान्तर्हिताश्चैव प्रेक्षतामेव तेऽभवन् ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
क्षणेनासीन्महाराज क्षतजौघप्रवर्तिनी ||
७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
क्षणेनास्योपवर्तन्ते दोषा वैराग्यकारकाः ||
१४४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
क्षणेनाहन्स वलवान्येऽस्य दृष्टिपथे स्थिताः |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
क्षणेनैव च पार्थांस्ते वहुत्वात्समलोडय़न् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षणेनैव वने तस्मिन्समाजग्मुरभीतवत् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
क्षणेनैवाभवत्सर्वमद्भुतं मधुसूदन |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
क्षणेनैवाभवद्द्रोणो नातिहृष्टमना इव ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
क्षण्येते तस्य तौ पादौ सुगुप्तमभिधावतः ||
७२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
क्षतं च स्खलितं चैव पतितं क्लिष्टमाहतम् |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
क्षतः किल करे राजंस्तस्य शाकरसोऽस्रवत् |
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
क्षतः किल करे राजंस्तस्य शाकरसोऽस्रवत् ||
९८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
क्षतक्षीणाभितप्तानां ग्राम्यधर्मरताश्च ये |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
क्षतजोक्षितसर्वाङ्गः क्षरन्स रुधिरं व्रणैः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षताच्च नस्त्राय़तीति स तस्मात्क्षत्रिय़ः स्मृतः ||
१३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
क्षतात्त्राता क्षताज्जीवन्क्षान्तस्त्रिष्वपि साधुषु |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
क्षताद्भीतं विजानीय़ादुत्तमं मित्रलक्षणम् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
क्षताश्च वहुभिः शस्त्रैर्युद्धशौण्डैरनेकशः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
क्षते क्षारं स हि ददौ पाण्डवस्य महात्मनः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्तः क्षुव्धार्णवनिभः किमेष सुमहास्वनः |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
धृतराष्ट्र उवाच
क्षत्तः पुत्रेषु पुत्रैर्मे कलहो न भविष्यति |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय
१९८
धृतराष्ट्र उवाच
क्षत्तरानय़ गच्छैतान्सह मात्रा सुसत्कृतान् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्तर्यद्गुरुराचार्यो व्रवीति कुरु तत्तथा |
७ क