अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
क्षत्रवीर्यं च सकलं चरौ तस्या निवेशितम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
क्षत्रस्याभिप्रवृद्धस्य व्राह्मणेषु विशेषतः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
क्षत्रादेवं व्रह्मवलं गरीय़ो; न व्रह्मतः किञ्चिदन्यद्गरीय़ः |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
अर्जुन उवाच
क्षत्राद्वृत्तिर्व्राह्मणानां तैः कथं व्राह्मणो वरः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ं तूग्रकर्माणं त्वं भद्रे जनय़िष्यसि |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५६
च्यवन उवाच
क्षत्रिय़ं विप्रकर्माणं वृहस्पतिमिवौजसा |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ः क्षत्रिय़ं जित्वा रणे रणकृतां वरः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
क्षत्रिय़ः क्षत्रिय़ं हन्ति मत्स्यो मत्स्येन जीवति |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
क्षत्रिय़ः क्षत्रिय़श्रेष्ठ पृथिवीमनुशास्ति वै ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५०
कुन्त्यु उवाच
क्षत्रिय़ः क्षत्रिय़स्यैव कुर्वाणो वधमोक्षणम् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ः क्षितिमाप्नोति क्षिप्रं धर्मं यशः श्रिय़म् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ः शतवर्षी च दशवर्षी च व्राह्मणः |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
१४
कृष्ण उवाच
क्षत्रिय़ः शस्त्रमरणो यदा भवति सत्कृतः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
उमो उवाच
क्षत्रिय़ः शूद्रतामेति केन वा कर्मणा विभो ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५०
कुन्त्यु उवाच
क्षत्रिय़ः स शुभाँल्लोकान्प्राप्नुय़ादिति मे श्रुतम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ः सन्पुनः प्राप्तो व्राह्मण्यं लोकसत्कृतम् ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ः सर्वशो राजन्यस्य वृत्तिः पराजय़े ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ः सोऽप्यथ तथा व्रह्मवंशस्य कारकः ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
क्षत्रिय़ः स्वर्गभाग्राजंश्चिरं पालय़ते महीम् ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़प्रवरो लोके नित्यं शूराभिसत्कृतः ||
१९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
क्षत्रिय़स्तरसा प्राप्तमन्नं यो वै प्रय़च्छति ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
क्षत्रिय़स्य गुणैरेभिरन्वितस्य फलं शृणु |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़स्य तु धर्मोऽय़ं यद्युद्धं भृगुनन्दन |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
क्षत्रिय़स्य तु यो धर्मः स नेहेष्यति वै तव |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
क्षत्रिय़स्य तु सर्वस्य नान्यो धर्मोऽस्ति संय़ुगात् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
क्षत्रिय़स्य प्रमत्तस्य दोषः सञ्जाय़ते महान् |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़स्य मलं भैक्षं व्राह्मणस्यानृतं मलम् |
६८ क
सभा पर्व
अध्याय
५०
दुर्योधन उवाच
क्षत्रिय़स्य महाराज जय़े वृत्तिः समाहिता |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़स्य विधीय़न्ते न परस्वोपजीवनम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़स्य विशेषेण धर्मस्तु वलमौरसम् ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़स्य विशेषेण हृदय़ं वज्रसंहतम् ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
क्षत्रिय़स्य सदा धर्मो नान्यः शत्रुनिवर्हणात् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
क्षत्रिय़स्य स्मृतो धर्मः प्रजापालनमादितः |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़स्य हि गान्धर्वो विवाहः श्रेष्ठ उच्यते |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़स्य हि वालिश्याद्व्राह्मणः क्लिश्यते क्षुधा |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़स्य ह्ययं धर्मो हन्याद्धन्येत वा पुनः ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़स्यापि भार्ये द्वे विहिते कुरुनन्दन |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़स्यापि यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि भारत |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़स्याप्यथो व्रूय़ात्प्रीय़न्तां पितरस्त्विति ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
क्षत्रिय़स्येत्यतो जातमिदं कौतूहलं मम ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
२०
जरासन्ध उवाच
क्षत्रिय़स्यैतदेवाहुर्धर्म्यं कृष्णोपजीवनम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
क्षत्रिय़स्यैव ते धैर्यं कामय़ा सत्यमुच्यताम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षत्रिय़ा अपि वैश्याश्च विकर्मस्था नराधिप ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ा निधनं यान्ति कर्णदुर्मन्त्रितेन च ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
क्षत्रिय़ा मे स्वकर्मस्था मामकान्तरमाविशः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ा वर्जय़ामासुर्युगान्ताग्निमिवोल्वणम् ||
११८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ा वहवश्चान्ये जय़द्रथवधैषिणम् ||
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ा वहवो राजन्नुपावर्तन्त सर्वशः ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
धृतराष्ट्र उवाच
क्षत्रिय़ा वैश्यवर्गा वा शूद्रा वापि कुटुम्विनः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ाः क्षत्रधर्मेण वध्यन्ते यदि संय़ुगे |
४५ क