chevron_left  क्षत्रिय़ाणांarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ाणां च वक्ष्यामि तवापि विदितं पुनः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ाणां च विहितं सङ्ग्रामे निधनं विभो ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५५
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ाणां तथा कृष्ण समरे देहपातनम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १६९
वसिष्ठ उवाच
क्षत्रिय़ाणां तदा तात कारणान्तरदर्शनात् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ाणां तदा वाचः श्रुत्वा परपुरञ्जय़ः |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ाणां तदान्योन्यं संय़ुगे जय़मिच्छताम् |
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ाणां तु यो दृष्टो विधिस्तमपि मे शृणु |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
क्षत्रिय़ाणां तु शेषार्थं करेणोद्दिश्य कश्यपः |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ाणां प्रतपतां तेजसा च वलेन च |
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३४
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ाणां प्रतपतां तेजसा च वलेन च |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ाणां महाराज सङ्ग्रामे निधनं स्मृतम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ाणां वलं ज्येष्ठं योद्धव्यं क्षत्रवन्धुना |
११ क
आदि पर्व
अध्याय १६५
वसिष्ठ उवाच
क्षत्रिय़ाणां वलं तेजो व्राह्मणानां क्षमा वलम् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ाणां विशेषेण येषां युद्धेन जीविका ||
६२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ाणां स्थितो धर्मे क्षत्रिय़ोऽस्मि तपोधन |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ाणामनीकानि प्रद्रुतान्यभिधावताम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ाणामभावाय़ दृष्ट्वा द्रोणमवस्थितम् |
८६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५६
च्यवन उवाच
क्षत्रिय़ाणामभावाय़ दैवय़ुक्तेन हेतुना |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ाणामभावाय़ व्राह्ममात्मानमास्थितः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८
शल्य उवाच
क्षत्रिय़ाणामभावोऽय़ं युधिष्ठिर महात्मनाम् |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ाननय़ञ्शूरान्प्रेतराजनिवेशनम् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ान्तकरं राममेकमेकः समासदम् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ाभ्यश्च ये जाता व्राह्मणास्ते च विश्रुताः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षत्रिय़ाश्च प्रवर्तन्ते सर्ववर्णानुरञ्जने ||
९९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५६
च्यवन उवाच
क्षत्रिय़ाश्च भृगून्सर्वान्वधिष्यन्ति नराधिप |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ाश्च मनुष्येन्द्र गदाशक्तिधनुर्धराः |
१३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३
युधिष्ठिर उवाच
क्षत्रिय़ाश्च महात्मानः सम्वन्धिसुहृदस्तथा |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ाश्च महाराज ये चान्ये तत्र सैनिकाः ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
क्षत्रिय़ाश्च महावीर्या भगदत्तपुरोगमाः |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ाश्च सुय़ुद्धेन श्राद्धैरपि पितामहाः ||
१३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ाश्चैव वैश्याश्च शूद्राश्चैव समागताः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ास्तु जय़न्त्येव वहुलं चैकतो वलम् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ास्ते महाराज परस्परवधैषिणः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ाय़ा हरेत्पुत्रश्चतुरोंऽशान्पितुर्धनात् |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
युधिष्ठिर उवाच
क्षत्रिय़ाय़ां तथैव स्याद्वैश्याय़ामपि चैव हि ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ाय़ास्तथा वैश्या न जातु सदृशी भवेत् ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ाय़ास्तु यः पुत्रो व्राह्मणः सोऽप्यसंशय़ः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़े संशय़ः कः स्यादित्येतन्निश्चितं सदा |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़े सङ्गतं नास्ति न प्रीतिर्न च सौहृदम् |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ेण धनुर्नाम्यं स भवान्व्राह्मणव्रुवः ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय १६४
गन्धर्व उवाच
क्षत्रिय़ेण हि जातेन पृथिवीं जेतुमिच्छता |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ेण हि हन्तव्यः क्षत्रिय़ो लोभमास्थितः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ेषु न विश्वासः कार्यः सर्वोपघातिषु |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ेषु हतेष्वाशु शून्ये च शिविरे कृते ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
अर्जुन उवाच
क्षत्रिय़ेष्वाश्रितो धर्मः प्रजानां परिपालनम् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ैश्च मनुष्येन्द्र नानादेशसमागतैः |
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
क्षत्रिय़ो जीविताकाङ्क्षी स्तेन इत्येव तं विदुः ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
क्षत्रिय़ो धनुराश्रित्य यजेतैव न याजय़ेत् |
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
क्षत्रिय़ो नास्ति तुल्योऽस्य पृथिव्यां कश्चिदग्रणीः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ो नास्य तत्कर्म प्रशंसन्ति पुराविदः ||
१६ ख