शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ो नास्य तत्कर्म प्रशंसन्ति पुराविदः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
क्षत्रिय़ो यज्ञशिष्टाशी राजशास्त्रार्थतत्त्ववित् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
युधिष्ठिर उवाच
क्षत्रिय़ो यदि वा वैश्यः शूद्रो वा राजसत्तम |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ो रक्षणधृतिर्व्राह्मणोऽनर्थनाधृतिः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ो वा तपस्वी यो नान्यो विद्यात्कथञ्चन ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
क्षत्रिय़ो वा महाभागे वैश्यो वा धर्मचारिणि |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
क्षत्रिय़ो वाथ वैश्यो वा व्रह्मभूय़ाय़ गच्छति ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रिय़ो वाहुवीर्यस्तु न तथा वाक्यवीर्यवान् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ो वाहुवीर्येण तरत्यापदमात्मनः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ो वृत्तिसंरोधे कस्य नादातुमर्हति |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
क्षत्रिय़ो वैश्यशूद्रौ वा निसर्गादिति मे मतिः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
११५
भृगुरु उवाच
क्षत्रिय़ो व्राह्मणाचारो मातुस्तव सुतो महान् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ो हि स्वधर्मेण श्रिय़ं प्राप्नोति भूय़सीम् |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ोपनिवेशाश्च वैश्यशूद्रकुलानि च ||
६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ोऽध्ययने युक्तो यजने दानकर्मणि |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
क्षत्रिय़ोऽपि दहेत्क्रुद्धो यावत्स्पृशति तेजसा ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
क्षत्रिय़ोऽसि क्षतात्त्राता वाहुवीर्योपजीविता ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
क्षत्रिय़ोऽहं न जानामि देहीति वचनं क्वचित् |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
विश्वामित्र उवाच
क्षत्रिय़ोऽहं भवान्विप्रस्तपःस्वाध्याय़साधनः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
क्षत्रे जातश्च यः पूर्वमभवद्व्राह्मणो वलात् ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
क्षत्रे सम्राजमात्मानं कर्तुमर्हसि भारत ||
६० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
क्षत्रेणापि हि संसृष्टं तेजः शाम्यति वै द्विजे ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
क्षत्रोच्छेदाय़ विहितो जामदग्न्य इवास्थितः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
क्षन्तव्यं पुत्र धर्मो हि हतो हन्ति न संशय़ः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
क्षन्तव्यं पुरुषेणाहुरापत्स्वपि विजानता ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
क्षन्तव्यं पुरुषेणेह सर्वास्वापत्सु शोभने |
३२ क
विराट पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
क्षन्तव्यं भवता सर्वमाचार्येण कृपेण च ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
क्षन्तव्यमेव तस्याहुः सुपरीक्ष्य परीक्षय़ा ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
क्षन्तव्यमेव सततं पुरुषेण विजानता |
४१ क
विराट पर्व
अध्याय
६६
विराट उवाच
क्षन्तुमर्हति तत्सर्वं धर्मात्मा ह्येष पाण्डवः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
क्षन्तुमर्हसि तत्सर्वं प्रसीद भगवन्निति ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
कण्व उवाच
क्षन्तुमर्हसि मे देव विह्वलस्याल्पचेतसः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
क्षन्तुमर्हसि मे राजन्प्रणतस्याभिय़ाचतः ||
१११ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षन्तुमर्हसि मे विप्र भर्ता मे दैवतं महत् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
क्षन्तुमर्हसि मे व्रह्मञ्शापोऽय़ं विनिवर्त्यताम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
क्षन्तुमर्हसि मे व्रह्मन्निति चोक्तो मय़ा मुनिः ||
२८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
क्षपितं पाण्डुपुत्रेण चेष्टतां नो विशां पते ||
२० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
क्षपिताः क्षत्रिय़ाः सर्वे शत्रूणां वर्धितं यशः ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
क्षपय़ामास तं कालं कृच्छ्रप्राणो द्विजोत्तमः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
क्षपय़ामास तीव्रेण तपसेत्यत उच्यते |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
क्षपय़ित्वा तु तं कालं गणितं कालचोदिताः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
क्षपय़िष्यति नः सर्वान्स सुव्यक्तं महारणे |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
क्षपय़िष्यति नो नूनं यादृशोऽस्य पराक्रमः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
क्षपय़िष्यति नो राजन्कालचक्रमिवोद्यतम् ||
१३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
क्षपय़िष्यति सेनां मे कृष्ण भीष्मो महास्त्रवित् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९४
भीष्म उवाच
क्षपय़ेय़ं महत्सैन्यं कालेनानेन भारत ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
क्षपय़ेय़ुर्महावाहो न स्याम यदि संय़ुगे ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षम वा यदि ते श्रद्धा मा वा कृष्ण मम क्षम |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
सौदास उवाच
क्षमं चेदिह वक्तव्यं मय़ा द्विजवरोत्तम |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
दुर्योधन उवाच
क्षमं चेन्मन्यसे युद्धं मम तेनाद्य शाधि माम् |
३२ क