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वन पर्व
अध्याय २१३
केश्यु उवाच
क्षमं ते जीवतो गन्तुं स्वपुरं पाकशासन ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
क्षमं मम सहानेन नैकत्वमनय़ा सह |
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५६
भीष्म उवाच
क्षमते सर्वतः साधुः साध्वाप्नोति च सत्यवान् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
क्षममाणं नृपं नित्यं नीचः परिभवेज्जनः |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
श्रीरु उवाच
क्षममेतद्धि वो गावः प्रतिगृह्णीत मामिह |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
क्षमस्व नचिरादिन्द्र त्वामप्युपगमिष्यति ||
६६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षमस्व याच्यमाना मे सञ्जीवय़ धनञ्जय़म् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
क्षमस्व राजन्यत्प्रोक्तं धर्मकामेन भीरुणा ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
क्षमा क्षमावतां श्रेष्ठ यय़ा भूमिस्तु युज्यते ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
क्षमा चैवानृशंस्यं च तत्कर्तास्म्यहमञ्जसा ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०८
गुरुरु उवाच
क्षमा चैवाप्रमादश्च यस्यैते स सुखी भवेत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
क्षमा तपः क्षमा शौचं क्षमय़ा चोद्धृतं जगत् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
क्षमा तितिक्षा दम आर्जवं च; सत्यव्रतत्वं श्रुतमप्रमादः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
क्षमा तेजस्विनां तेजः क्षमा व्रह्म तपस्विनाम् |
३९ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
क्षमा दमश्च सत्यं च आनृशंस्यमथार्जवम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः क्षमा वेदाः क्षमा श्रुतम् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३८
व्रह्मो उवाच
क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
व्रह्मो उवाच
क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
क्षमा प्रशस्यते लोके न तु पापोऽर्हति क्षमाम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
क्षमा भवो हि भूतानां जन्म चैव प्रकीर्तितम् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय १६५
वसिष्ठ उवाच
क्षमा मां भजते तस्माद्गम्यतां यदि रोचते ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ९२
लोमश उवाच
क्षमा लक्ष्मीश्च धर्मश्च नचिरात्प्रजहुस्ततः |
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
क्षमा वै साधुमाय़ा हि न हि साध्वक्षमा सदा |
२९ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
क्षमा व्रह्म क्षमा सत्यं क्षमा भूतं च भावि च |
३७ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
क्षमा सत्यं सत्यवतां क्षमा दानं क्षमा यशः ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
क्षमा सत्यार्जवं शौचं शिष्टाचारनिदर्शनम् ||
७९ ख
वन पर्व
अध्याय २९
द्रौपद्यु उवाच
क्षमा स्विच्छ्रेय़सी तात उताहो तेज इत्युत |
३ क
वन पर्व
अध्याय २९
प्रह्लाद उवाच
क्षमाकालांस्तु वक्ष्यामि शृणु मे विस्तरेण तान् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
क्षमानुकम्पा कारुण्यमानृशंस्यं न विद्यते |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
क्षमारित्रां सत्यमय़ीं धर्मस्थैर्यवटाकराम् |
३९ क
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
क्षमावतः कुलीनांश्च द्वारेण प्राविशंस्ततः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
क्षमावतामय़ं लोकः परश्चैव क्षमावताम् |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय ३८
शमीक उवाच
क्षमावतामय़ं लोकः परश्चैव क्षमावताम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
क्षमावतो जय़ो नित्यं साधोरिह सतां मतम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
क्षमावन्तं हि पापात्मा जितोऽय़मिति मन्यते ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
क्षमावन्तश्च धीराश्च धर्मकार्येषु चोत्थिताः |
८६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
क्षमावन्तो निराकाराः काष्ठेऽग्निरिव शेरते ||
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
क्षमावन्तो निराकाराः काष्ठेऽग्निरिव शेरते ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २७७
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षमावाननपत्यश्च सत्यवाग्विजितेन्द्रिय़ः |
७ क
वन पर्व
अध्याय २७८
राजो उवाच
क्षमावानपि वा शूरः सत्यवान्पितृनन्दनः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
क्षमावान्निरमर्षश्च नैव स्त्री न पुनः पुमान् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
क्षमावान्रूपसम्पन्नः श्रुतवांश्चैव जाय़ते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
क्षमाय़ां विपुला लोकाः सुलभा हि सहिष्णुना ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
क्षमाय़ाश्चाक्षमाय़ाश्च विद्धि पार्थ प्रय़ोजनम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय २९
प्रह्लाद उवाच
क्षमिणं तादृशं तात व्रुवन्ति कटुकान्यपि |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १२२
लोमश उवाच
क्षमिष्यामि महीपाल सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
क्षमिष्येऽक्षममाणानां न हिंसिष्ये च हिंसितः |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
क्षमेदशक्तः सर्वस्य शक्तिमान्धर्मकारणात् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
क्षम्यतामिति चोवाच यदुक्तोऽसि मय़ा रुषा ||
२० ख