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सभा पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षम्यतामेवमित्येवं सर्वं सम्भवति त्वय़ि ||
३८ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
क्षमय़न्तं तु राजानं पाण्डवः प्रत्यभाषत |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६६
भीष्म उवाच
क्षमय़ा क्रोधमुच्छिन्द्यात्कामं सङ्कल्पवर्जनात् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५७
भीष्म उवाच
क्षमय़ा तिष्ठते राजञ्श्रीमांश्च विनिवर्तते ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
क्षमय़ा पृथिवीतुल्यो महेन्द्रसमविक्रमः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय ३८
शमीक उवाच
क्षमय़ा प्राप्स्यसे लोकान्व्रह्मणः समनन्तरान् ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
क्षमय़ामास कौन्तेय़ं भस्मच्छन्नमिवानलम् ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
क्षमय़ित्वा तु कौरव्यं रणादुत्तरमागतम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३७
श्रीभगवानु उवाच
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
क्षरः सर्वेषु भूतेषु दिव्यं ह्यमृतमक्षरम् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
क्षरन्त इव जीमूता मदार्द्राः पद्मगन्धिनः |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
क्षरन्त इव जीमूताः सुदन्ताः षष्टिहाय़नाः ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षरन्त इव नागेन्द्राः सर्व आशीविषोपमाः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
क्षरन्तः शोणितं गात्रैर्नगा इव जलप्लवम् ||
१०५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
क्षरन्तः स्वरसं रक्तं प्रकृताश्चन्दना इव ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १००
नारद उवाच
क्षरन्ती सततं क्षीरं पृथिवीसारसम्भवम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
क्षरन्निव महामेघो वारिधाराः सहस्रशः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
शुक उवाच
क्षरात्प्रभृति यः सर्गः सगुणानीन्द्रिय़ाणि च |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
क्षरो भवत्येष यदा तदा गुणवतीमथ |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२०
व्यास उवाच
क्षात्रं चैव व्रतं कीट भूतानां परिपालनम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२०
व्यास उवाच
क्षात्रं चैव व्रतं ध्याय़ंस्ततो विप्रत्वमेष्यसि ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षात्रं धर्मं महाराज समवेक्षितुमर्हसि |
१३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
क्षात्रधर्मपराः प्राज्ञा यज्वानो भूरिदक्षिणाः ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
क्षात्रधर्मिणमप्याजौ केतय़ेत्कुलजं द्विजम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
क्षात्रमाचरतो मार्गमपि वन्धोस्त्वदन्तरे ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
क्षात्राणि वैश्यानि च सेवमानः; शौद्राणि कर्माणि च व्राह्मणः सन् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
क्षात्राद्धर्माद्धीय़ते पाण्डुपुत्र; स्तं त्वं राजन्राजधर्मे निय़ुङ्क्ष्व ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
मान्धातो उवाच
क्षात्राद्धर्माद्विपुलादप्रमेय़ा; ल्लोकाः प्राप्ताः स्थापितं स्वं यशश्च |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२०
व्यास उवाच
क्षात्रीं तनुं समुत्सृज्य ततो विप्रत्वमेष्यसि ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
क्षात्रेण च वलेनास्य चिन्तय़न्नान्वपद्यत |
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
क्षात्रेण च वलेनास्य नापश्यत्स पराजय़म् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षात्रेण धर्मेण पराक्रमेण; जित्वा महीं मन्त्रविद्भ्यः प्रदाय़ |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
व्यास उवाच
क्षात्रेण धर्मेण मही जिता ते; तां भुङ्क्ष्व कुन्तीसुत मा विषादीः ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
क्षात्रेण धर्मेण वसूनि लव्ध्वा; सर्वे ह्यवाप्ताः क्रतवः पुराणाः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
क्षात्रेण विधिना प्राप्तो वीराभिलषितां गतिम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
इन्द्र उवाच
क्षात्रो धर्मो ह्यादिदेवात्प्रवृत्तः; पश्चादन्ये शेषभूताश्च धर्माः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १२८
लोमश उवाच
क्षान्त उष्यात्र षड्रात्रं प्राप्नोति सुगतिं नरः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
क्षान्तमेकेन भक्तेन तेन विप्रत्वमागतः ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय ७
विदुर उवाच
क्षान्तमेव मय़ा राजन्गुरुर्नः परमो भवान् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
क्षान्तमेव मय़ेत्युक्त्वा कुण्डधारो द्विजर्षभम् |
५१ क
सभा पर्व
अध्याय ४३
दुर्योधन उवाच
क्षान्तवन्तोऽपराधं तं को हि तं क्षन्तुमर्हति ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ३८
सूत उवाच
क्षान्तवांस्तव तत्कर्म पुत्रस्तस्य न चक्षमे ||
१८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
क्षान्ताः शीलगुणोपेताः सन्धेय़ाः पुरुषोत्तमाः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
क्षान्तान्दान्तांस्तथा प्राज्ञान्दीर्घकालं सहोषितान् |
७९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
क्षान्तो दान्तो जितक्रोधः स गच्छति परां गतिम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
क्षान्तो दान्तो जितक्रोधो धर्मभूतोऽविहिंसकः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
क्षान्त्या धृत्या च वुद्ध्या च मनसा तपसैव च ||
१५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
क्षान्त्या भक्त्या च धृत्या च वुद्ध्या च वचसा तथा ||
६० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
क्षान्त्या मह्या गोपने धारणे च; दीप्त्या कृशानोस्तपनस्य चैव |
९१ क
वन पर्व
अध्याय १२२
लोमश उवाच
क्षामकण्ठश्च व्रह्मर्षिस्तपोवलसमन्वितः |
११ ख