द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
क्षिण्वन्ति हृदय़ं मेऽद्य घोराः पावकतेजसः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
क्षितावटसि राजंस्त्वमन्तरिक्षे चराम्यहम् |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षितावन्धकवृष्णीनां वंशे वंशभृतां वरः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
क्षितिं द्यां च दिशश्चैव माय़यावृत्य दंशितः ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
क्षितिं वा देवलोकं वा गम्यतां यदि रोचते |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
क्षितिं विय़द्द्यां विदिशो दिशस्तथा; समावृणोत्पार्थिव संय़ुगे तदा ||
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
क्षितिकम्पे यथा शैलः सवृक्षगणगुल्मवान् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षितितलशय़नः शिखी यतात्मा; वृष इव राजवृषस्तदा वभूव ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
क्षितिस्थं सहदेवं च क्षिपन्तं राक्षसं तदा ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६२
गन्धर्व उवाच
क्षितौ निपतितं काले शक्रध्वजमिवोच्छ्रितम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
क्षितौ राधःप्रभवः शश्वदेव; प्राजापत्याः सर्वमित्यर्थवादः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
क्षितौ विवभ्राज पतत्सकुण्डलं; विशाखय़ोर्मध्यगतः शशी यथा ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
क्षिपतश्च शरानस्य रणे शत्रून्विनिघ्नतः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिपत्येकेन वेगेन पञ्च वाणशतानि यः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिपत्येकेन वेगेन पञ्च वाणशतानि यः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिपत्येकेन वेगेन पञ्च वाणशतानि यः |
२९ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिपन्तौ शरजालानि मोहय़ामासतुर्नृपान् ||
२१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्तं क्रुद्धेन तं वृक्षं प्रतिजग्राह वीर्यवान् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्तं क्षिप्तं रणे चैतत्त्वय़ा माधव शत्रुषु |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्तं क्षिप्तं हि तच्चक्रं कृष्णस्यामित्रघातिनः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
क्षिप्तश्च सहसा रुद्रे खण्डनं प्राप्तवांस्तदा |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्ता भ्राम्य शरैः सापि कर्णेनाभ्याहतापतत् ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्ता श्रुताय़ुधेनाथ तस्मात्तमवधीद्गदा ||
५५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्ता ह्येका तथा शक्तिः सुघोरानलसूनुना |
६३ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षिप्ताक्षिप्ता तु सा शक्तिर्हत्वा शत्रून्सहस्रशः |
६७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्तानि क्षिप्यमाणानि तानि चास्त्राणि धर्मजः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षिप्तामिषीकां काकस्य चित्रकूटे महागिरौ |
६७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३६
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्तैः कनकचित्रैश्च नृपच्छत्रैः क्षितिर्वभौ |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्तैः काञ्चनदण्डैश्च नृपच्छत्रैः क्षितिर्वभौ |
११८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०७
भीष्म उवाच
क्षिप्यन्ते तेन तेनैव निष्टनन्तः पुनः पुनः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
क्षिप्रं कुरुत गच्छध्वं प्रलोभय़त माचिरम् ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रं कुरून्याहि कुरुप्रवीर; विजित्य गाश्च प्रतिय़ातु पार्थः ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्रं गच्छत भद्रं वो राजानं परिरक्षत |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रं गोपान्समासाद्य गृह्णन्तु विपुलं धनम् ||
२५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्रं च समनह्यन्त किमेतदिति चाव्रुवन् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
इन्द्र उवाच
क्षिप्रं छिन्धि शिरांसि त्वं करिष्येऽनुग्रहं तव ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
क्षिप्रं छिन्धि शिरांस्यस्य कुरुष्व वचनं मम ||
२५ ग
वन पर्व
अध्याय
६१
सार्थवाह उवाच
क्षिप्रं जनपदं गन्ता लाभाय़ मनुजात्मजे ||
१२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२
शल्य उवाच
क्षिप्रं त्वामभिकामश्च विनशिष्यति पार्थिवः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रं न स भवेद्व्यक्तमिति त्वां वेद्मि कौरव ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८
शल्य उवाच
क्षिप्रं नाशं गमिष्यन्ति कर्णदुर्योधनादय़ः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रं निवर्तध्वमलं मृगैर्नो; मनो हि मे दूय़ति दह्यते च |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
क्षिप्रं प्रणुदते पापं सत्कारं लभते तथा |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
क्षिप्रं प्रवध्यते मूढो न हि वैरं प्रशाम्यति ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्रं प्राप्नुहि कौन्तेय़ मनसा यद्यदिच्छसि ||
१८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय
३५
उत्तर उवाच
क्षिप्रं मे रथमास्थाय़ निगृह्णीष्व हय़ोत्तमान् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
क्षिप्रं मय़ि प्रहरत यदीच्छथ रणे जय़म् |
६६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
क्षिप्रं यशस्तं समुपैति सन्तमलं; प्रसन्ना हि सुखाय़ सन्तः ||
१ ख