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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
क्षीणदोषो गुणान्हित्वा क्षेत्रज्ञं प्रविशत्यथ ||
३९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
क्षीणद्रव्यगुणं ज्योतिरन्तर्धानाय़ गच्छति ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
क्षीणमांसैर्विरुधिरैर्विमज्जान्त्रैर्विसन्धिभिः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
दुर्योधन उवाच
क्षीणरत्नां च पृथिवीं हतक्षत्रिय़पुङ्गवाम् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
क्षीणवाणौ विधनुषौ भग्नखड्गौ महीं गतौ |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
क्षीणवाहाय़ुधः शूरः स्थितोऽभिमुखतः परान् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
क्षीणशस्त्रस्तु कौन्तेय़ः कर्णेन समभिद्रुतः |
६२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
क्षीणशस्त्रो विवर्मा च न हन्तव्यः कथञ्चन ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
युधिष्ठिर उवाच
क्षीणसङ्ग्रहवृत्तिश्च यथावत्सम्प्रकीर्तिता |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२९
युधिष्ठिर उवाच
क्षीणस्य दीर्घसूत्रस्य सानुक्रोशस्य वन्धुषु |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
क्षीणस्याथाभिय़ुक्तस्य श्मशानाभिमुखस्य च |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
क्षीणस्याप्याय़नं दृष्टं क्षतस्य क्षतरोहणम् |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
गन्धर्व उवाच
क्षीणाः क्षीणा भवन्त्येते न हीय़न्ते च रंहसः ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षीणानुभय़तः शूरान्रथेभ्यो रथिभिर्हतान् ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
उमो उवाच
क्षीणाय़ुः केन भवति कर्मणा भुवि मानवः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
क्षीणाय़ुधे सात्वते युध्यमाने; ततोऽव्रवीदर्जुनं वासुदेवः |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
क्षीणाय़ुषं पाण्डवेय़मपावर्तत काश्यपः |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
क्षीणाय़ुषस्तथैवान्ये नश्यन्ति पृथिवीतले ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षीणे कलिय़ुगे चैव प्रवर्तति कृतं युगम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२९
युधिष्ठिर उवाच
क्षीणे कोशे स्रुते मन्त्रे किं कार्यमवशिष्यते ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
क्षीणे च पुण्ये विगते च पापे; ततोनिमित्ते च फले विनष्टे |
४६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
क्षीणे मनसि सर्वस्मिन्न जन्मसुखमिष्यते |
४२ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षीणे युगे महाराज तरुणा वृद्धशीलिनः |
५४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
क्षीणे रथपथे प्राज्ञो रथमुत्सृज्य गच्छति ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
क्षीणेन्द्रिय़मनोवुद्धिर्निरीक्षेत निरिन्द्रिय़ः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय १०१
देवा ऊचुः
क्षीणेषु च व्राह्मणेषु पृथिवी क्षय़मेष्यति |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
क्षीणोऽन्नसञ्चय़ो विप्र वदराणीह भक्षय़ |
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
क्षीणौषधिसमावाय़ो द्रव्यहीनोऽभवत्तदा ||
५ ग
सभा पर्व
अध्याय ५४
युधिष्ठिर उवाच
क्षीरं पिवन्तस्तिष्ठन्ति भुञ्जानाः शालितण्डुलान् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
क्षीरं स्रवन्त्यः सरितस्तथा चैवान्नपर्वताः |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
क्षीरविक्रय़िकाश्चैव ते वै निरय़गामिनः ||
७२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
क्षीरस्यैताः सर्पिषश्चैव नद्यः; शश्वत्स्रोताः कस्य भोज्याः प्रदिष्टाः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
क्षीरस्रवा वै सरितो गिरींश्च; सर्पिस्तथा विमलं चापि तोय़म् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
क्षीरोदः सागरश्चैव यत्र यत्रेच्छसे मुने ||
१९२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
क्षीरोदः सागराणां च शैलानां हिमवान्गिरिः |
१६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
क्षीरोदधेरुत्तरतः श्वेतद्वीपो महाप्रभः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
क्षीरोदधेरुत्तरतो हि द्वीपः; श्वेतः स नाम्ना प्रथितो विशालः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
क्षीरोदनं च भुङ्क्ष्व त्वममृतेन समन्वितम् ||
१९३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
क्षीरोदनं च भुञ्जीय़ामक्षय़ं सह वान्धवैः |
१८९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
क्षीरोदनसमाय़ुक्तं भोजनं च प्रय़च्छ मे ||
८० ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
क्षीरोदमथनं चैव जन्मोच्छैःश्रवसस्तथा ||
७३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
क्षीरोदस्य समुद्रस्य तथैवोत्तरतः प्रभुः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
वैशम्पाय़न उवाच
क्षीरोदस्य समुद्रस्य मध्ये हाटकसप्रभः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जग्मुर्लोकहितार्थिनः ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
क्षीरोदो भरतश्रेष्ठ येन सम्परिवारितः ||
९ ग
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
क्षीववद्विह्वलत्वात्तु निमेषात्पुनरुत्थितः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
क्षीववद्विह्वलो वीरो निमेषात्पुनरुत्थितः |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
क्षीवा इवान्ये चोन्मत्ता रङ्गेष्विव च चारणाः |
२० क
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षीय़तां दुष्कृतं कर्म वनवासकृतं तव |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
क्षीय़ते च नरस्तस्मान्न त्वं शोचितुमर्हसि ||
८ ख