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वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
ततो वेण्णां समासाद्य तर्पय़ेत्पितृदेवताः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय ५१
सूत उवाच
ततो वेदविदस्तत्र सदस्याः सर्व एव तम् |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वै तपसा तेन प्राप्य वेदाननुत्तमान् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
ततो वै तमृषिश्रेष्ठं मैथुनोपगतं तथा |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वै द्वापरं नाम मिश्रः कालो भविष्यति |
७५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
ततो वै रथघोषेण गर्जितेन मृगा इव |
१०१ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ततो वै व्राह्मणीं गत्वा व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |
५२ क
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वैकर्तनं जित्वा पार्थो वैराटिमव्रवीत् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १०४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वैकर्तनः कर्णः कर्मणा तेन सोऽभवत् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वैकर्तनः कर्णः शकुनिश्चापि सौवलः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वैकर्तनः कर्णो जगामार्जुनमोजसा |
७ क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वैडूर्यवर्णाभो भासय़न्सर्वतो दिशः |
५ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
ततो वैतरणीं गत्वा नदीं पापप्रमोचनीम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वैतरणीं सर्वे पाण्डवा द्रौपदी तथा |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वैतालिकैः सूतैर्मागधैश्च सुभाषितैः |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वैप्राश्निकाः प्राहुः पशुविप्रकृतस्त्वय़ा |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
ततो वैरविनिर्वन्धः कृतो राहुमुखेन वै |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७५
होत्रवाहन उवाच
ततो वैवाहिकं दृष्ट्वा कन्येय़ं समुपार्जितम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो वैश्रवणं तत्र ददृशुर्नरवाहनम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
ततो वैश्रवणः प्रीतो विस्मितः समपद्यत ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
ततो वैश्रवणो राजा भगवन्तमुवाच ह |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
ततो वैश्रवणो राजा मुचुकुन्दमदर्शय़त् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
ततो वैश्रवणो राजा रक्षांसि समवासृजत् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
ततो वैश्रवणो राजा विस्मय़ं परमं यय़ौ |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
ततो वैश्रवणोऽभ्येत्य अष्टावक्रमनिन्दितम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १२१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्यतीते पृषते स राजा द्रुपदोऽभवत् |
१० क
सभा पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्यध्वगतं पार्थं प्रातिकामी युधिष्ठिरम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्यपेते तमसि सूर्ये विमल उद्गते |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्यपोहमानास्ते पाण्डवार्थे हुताशनम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
ततो व्यमुह्यन्त रणे नृवीराः; प्रमोहनास्त्राहतवुद्धिसत्त्वाः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
ततो व्यरोचत द्रोणो विनिघ्नन्सर्वसोमकान् |
८० क
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
ततो व्याकुलितं सर्वं द्वारकावासि तद्वलम् |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्याघ्रैश्च सिंहैश्च द्विरदैश्चाप्ययोधय़त् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्यावृत्य राजानं दुर्योधनममर्षणम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्यासः परमोदारकर्मा; शुचिर्विप्रस्तपसा तस्य राज्ञः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
ततो व्यासवनं गच्छेन्निय़तो निय़ताशनः |
७८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्यासश्च भगवान्देवस्थानोऽश्मना सह |
२५ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
ततो व्यासस्थली नाम यत्र व्यासेन धीमता |
८१ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्यासाभ्यनुज्ञातो धृतराष्ट्रो महीपतिः |
९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्यासो महातेजाः पुण्यं भागीरथीजलम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
ततो व्याय़च्छतामस्त्रैः पृथक्पृथगरिन्दमौ |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
ततो व्युदस्तं तत्सैन्यं सिन्धुसौवीरकौरवम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
ततो व्यूढान्यनीकानि तव तेषां च भारत |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
ततो व्यूढेष्वनीकेषु तावकेष्वितरेषु च |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
ततो व्यूढेष्वनीकेषु समुत्क्रुष्टेषु मारिष |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
ततो व्यूहं यथापूर्वं प्रत्यव्यूहन्त ते पुनः ||
९७ ख
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
ततो व्योम महाराज शतसूर्यमिवाभवत् |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८५
भीष्म उवाच
ततो व्योम्नि प्रादुरभूत्तेज एव हि केवलम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
ततो व्योम्नि विषक्तानि शरजालानि भागशः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्रजन्नेव गदाग्रजः प्रभुः; शशंस तस्मै निखिलेन तत्त्वतः |
१५ क