आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
व्रह्मो उवाच
क्षेत्रज्ञसत्त्वय़ोरैक्यमित्येतन्नोपपद्यते ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३४
वासुदेव उवाच
क्षेत्रज्ञादेव परतः क्षेत्रज्ञोऽन्यः प्रवर्तते ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०४
गुरुरु उवाच
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं चक्रं स्निग्धाक्षं वर्तते ध्रुवम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं विद्वान्यो वेद स परः कविः ||
८१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितो धीरः श्रद्धादमपुरःसरः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
क्षेत्रज्ञोऽपि यदा तात तत्क्षेत्रे सम्प्रलीय़ते ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीपतिः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
क्षेत्रभूमिं ददल्लोके पुत्र श्रिय़मवाप्नुय़ात् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
क्षेत्रमव्यक्तमित्युक्तं ज्ञाता वै पञ्चविंशकः ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
क्षेत्रवीजसमाय़ोगात्ततः सस्यं समृध्यते ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
क्षेत्रस्थेषु च सस्येषु शत्रोरुपजपेन्नरान् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
क्षेत्राणि हि शरीराणि वीजानि च शुभाशुभे |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षेत्राद्वनाद्वा ग्रामाद्वा भर्तारं गृहमागतम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
क्षेत्रापणगृहासक्तं मृत्युरादाय़ गच्छति ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
क्षेत्रे क्षेत्रज्ञमासीनं तस्मै क्षेत्रात्मने नमः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य कृष्णद्वैपाय़नः पुरा |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य पाण्डुश्चैव महावलः ||
९५ ख
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षेत्रे सुकृष्टे ह्युपिते च वीजे; देवे च वर्षत्यृतुकालय़ुक्तम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
क्षेत्रौषध्यो यज्ञवाहाच्छन्दांस्यृषिगणा धरा ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
क्षेपणीषु च चित्रासु मुष्टिय़ुद्धेषु कोविदम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
क्षेपणीय़ैस्तथाप्यन्ये सात्वतस्य वधैषिणः |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
क्षेपण्यसिगदाशक्तिशरप्रासझषाकुलम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
क्षेपण्यसिगदाशक्तिशरप्राससमाकुलम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
क्षेपाभिमानादभिषङ्गव्यलीकं; निगृह्णाति ज्वलितं यश्च मन्युम् |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
क्षेप्तुं दैवपरीतात्मा यथैष कुलपांसनः ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
क्षेमं कुर्वन्ति संहत्य राजञ्जनपदे तव ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
क्षेमं च कृत्वा व्रजति तदा भवति भास्करः ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
क्षेमं च यदि कर्तव्यं तेषामर्धं प्रदीय़ताम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निरामय़म् ||
८८ ग
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
क्षेमकश्च महानागो नागः पिण्डारकस्तथा ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
क्षेमदर्शं नृपसुतं यत्र क्षीणवलं पुरा |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
क्षेमधन्वा सुमित्रश्च तस्थुः प्रमुखतो रथाः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
क्षेमधूर्तिर्महाराज विव्याधोरसि मार्गणैः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
क्षेमधूर्तिवृहन्तौ तौ भ्रातरौ सात्वतं युधि |
४५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
क्षेमधूर्तिस्तदा भीमं तोमरेण स्तनान्तरे |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
क्षेमधूर्तिस्तु सङ्क्रुद्धः केकय़स्य महात्मनः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
क्षेममद्य करिष्यामि धर्मराजस्य माधव |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
क्षेममद्य भवेद्यन्तरिति मे नैष्ठिकी मतिः ||
५७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
क्षेमवापः सुजातश्च सिद्धय़ात्रश्च भारत |
६१ क
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
क्षेमवृद्धिर्महाराज हिमवानिव निश्चलः ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षेमिणश्चाव्ययांश्चैव त्वत्तः सूत शृणोमि वै ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
क्षेमी गमिष्यसि गृहाञ्श्रमश्च न भविष्यति |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
क्षेमेण गच्छेदध्वानमिदं यः पठते पथि |
१०६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
क्षेमेण च विमुच्येत तस्य पुण्यफलं शृणु |
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
क्षेमेणोपरमेन्मार्गाद्वहुदोषो हि स स्मृतः ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
क्षेमोग्रतीर्थः कुहरः कलिङ्गेषु नराधिपः |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
क्षेम्यमात्मवतां मार्गमास्थिता हस्तदक्षिणम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
क्षेम्यश्चैकाकिना गम्यः पन्थाः कोऽस्तीति पृच्छ माम् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
क्षेम्याय़ हरिनेत्राय़ स्थाणवे पुरुषाय़ च ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
क्षोभं सम्प्राप्तवांस्तीव्रं प्रकृत्या कोपनः प्रभुः ||
४८ ख