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उद्योग पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
कथं ह्यवध्यैः सङ्ग्रामः कार्यः सह भविष्यति |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
कथं ह्यविजितां कृष्णां मन्यसे धृतराष्ट्रज |
३१ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
कथं ह्यस्मद्विधो जातु जानन्धर्मविनिश्चय़म् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
कथं ह्यस्मद्विधो व्रह्मन्वर्तमानो गृहाश्रमे |
५० क
वन पर्व
अध्याय ११०
युधिष्ठिर उवाच
कथंरूपा च शान्ताभूद्राजपुत्री यतव्रता |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
युधिष्ठिर उवाच
कथंविधं पुरं राजा स्वय़मावस्तुमर्हति |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८०
युधिष्ठिर उवाच
कथंविधाश्च राजेन्द्र तद्व्रूहि वदतां वर ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १२७
युधिष्ठिर उवाच
कथंवीर्यः स राजाभूत्सोमको वदतां वर |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
युधिष्ठिर उवाच
कथंवीर्यः समभवत्स राजा वदतां वरः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
शक्र उवाच
कथंवृत्तेषु दैत्येषु त्वमवात्सीर्वरानने |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
व्राह्मण्यु उवाच
कथंस्वभावा भगवन्नेतदाचक्ष्व मे विभो ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १३५
युधिष्ठिर उवाच
कथंय़ुक्तोऽभवदृषिर्भरद्वाजः प्रतापवान् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
कथका योधकाश्चैव राजन्नार्हन्ति केतनम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय २०६
वैशम्पाय़न उवाच
कथकाश्चापरे राजञ्श्रमणाश्च वनौकसः |
३ क
स्त्री पर्व
अध्याय १९
गान्धार्यु उवाच
कथञ्चिच्छिद्यते गृध्रैरत्तुकामैस्तलत्रवान् ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४३
आस्तीक उवाच
कथञ्चित्तक्षको मुक्तः सत्यत्वात्तव पार्थिव |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
कथञ्चित्तव गाङ्गेय़ विपत्तौ नास्ति नः कुलम् |
५८ क
वन पर्व
अध्याय ७२
केशिन्यु उवाच
कथञ्चित्त्वय़ि वैतेन कथितं स्यात्तु वाहुक ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
कथञ्चित्पाण्डवानीकं श्रय़ेय़ुः समरे स्थिताः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
कथञ्चित्सङ्कटान्मुक्तो मत्तद्विरदविक्रमः ||
८८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
कथञ्चिदपि वर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
कथञ्चिदभिवर्तन्त इत्येते सात्त्विका गुणाः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
कथञ्चिदभिवर्तन्ते विज्ञेय़ास्तामसा गुणाः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
कथञ्चिदभिवर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
कथञ्चिदवहञ्श्रान्ता वेपमानाः शरार्दिताः |
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
कथञ्चिदूहतुर्वीरौ दम्पती तं रथोत्तमम् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
कथञ्चिद्वर्तते सम्यक्केषाञ्चिद्वा न वर्तते ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
युधिष्ठिर उवाच
कथञ्चिद्वैश्यधर्मेण जीवेद्वा व्राह्मणो न वा ||
१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
कथञ्चिन्निर्ययौ धीमान्वेपमानः कृताञ्जलिः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
कथमक्षव्यसनजा वुद्धिरापतिता तव ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २०७
मार्कण्डेय़ उवाच
कथमग्निः पुनरहं भवेय़मिति चिन्त्य सः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय २२१
शार्ङ्गका ऊचुः
कथमग्निर्न नो दह्यात्कथमाखुर्न भक्षय़ेत् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २०७
युधिष्ठिर उवाच
कथमग्निर्वनं यातः कथं चाप्यङ्गिराः पुरा |
२ क
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
कथमत्र मय़ा कार्यं भगवांस्तद्व्रवीतु मे ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
कथमत्र मय़ा कार्यं श्रद्धा धर्मे परा च मे |
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
कथमद्भुतकर्माणं भीमसेनं महावलम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
शक्र उवाच
कथमद्य तदा चैव मनस्ते दानवेश्वर ||
१९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २२
गान्धार्यु उवाच
कथमद्य न तां कृष्ण मानय़न्ति स्म ते पुनः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
कथमद्य पुनर्वीर विनिहंसि मनांस्युत ||
१२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
धृतराष्ट्र उवाच
कथमद्य भविष्यामि प्रेष्यभूतो दुरन्तकृत् ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
कथमद्य भविष्यामि वृद्धः शत्रुवशं गतः ||
४२ ख
सभा पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
कथमन्तं न गच्छेम वृक्षस्येव नदीरय़ाः |
५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १४
गान्धार्यु उवाच
कथमन्धद्वय़स्यास्य यष्टिरेका न वर्जिता ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
कथमन्नं कथं दानं कथमध्ययनं तपः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
कथमन्वास्यते सोऽद्य शिवाभिः पतितो मृधे ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
कथमप्राप्तकौमारः सृञ्जय़स्य सुतो मृतः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पितो उवाच
कथमभ्याहतो लोकः केन वा परिवारितः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ४६
भीष्म उवाच
कथमभ्युदय़े तेषां न प्रमुह्येत पण्डितः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ९९
सत्यवत्यु उवाच
कथमराजकं राष्ट्रं शक्यं धारय़ितुं प्रभो |
४१ क
वन पर्व
अध्याय १६३
वैशम्पाय़न उवाच
कथमर्जुन कालोऽय़ं स्वर्गे व्यतिगतस्तव |
३ क