आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
कक्षघ्नः शिशिरघ्नश्च महाकक्षे विलौकसः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
कक्षमग्निमिवोद्धूतः प्रदहंस्तव वाहिनीम् |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
कक्षमिद्धो यथा वह्निर्निदाघे ज्वलितो महान् ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
कक्षसेनः क्षितिपतिः क्षेमकश्चापराजितः |
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
कक्षसेनश्च राजर्षिर्ये चान्ये नानुकीर्तिताः ||
५० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
कक्षसेनार्ष्टिषेणौ च सिन्धुद्वीपश्च पार्थिवः ||
३२ ग
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
कक्षसेनोग्रसेनौ च चित्रसेनश्च वीर्यवान् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
कक्षीवाञ्जामदग्न्यश्च रामस्ताण्ड्यस्तथांशुमान् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
कक्षीवानौशिजश्चैव नाचिकेतोऽथ गौतमः |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
कक्षीवान्गौतमस्तार्क्ष्यस्तथा वैश्वानरो मुनिः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
कक्षे रुधिरपातेन तथा धर्मपदं नय़ेत् ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
कक्ष्याभिरथ तोत्त्रैश्च घण्टाभिस्तोमरैस्तथा ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
कङ्कगृध्रमहाग्राहां नैकाय़ुधझषाकुलाम् |
१२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
कङ्कवर्हिणवासोभिर्वलं व्यधमदर्जुनः ||
९३ ख
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
कङ्कवल्लवगोपाला दामग्रन्थिश्च वीर्यवान् |
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
कङ्का गृध्रा वडाश्चैव वाय़साश्च विशां पते |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
कङ्का गृध्रा वलाकाश्च व्याहरन्ति मुहुर्मुहुः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
कङ्कालवहुले घोरे सर्वप्राणिभय़ङ्करे ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
कङ्को नाम द्विजो भूत्वा मताक्षः प्रिय़देविता ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
कङ्को मद्गुश्च गृध्राश्च काकोलूकं तथैव च ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
शुक्र उवाच
कच सुस्वागतं तेऽस्तु प्रतिगृह्णामि ते वचः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
कचग्रहमनुप्राप्ता सास्मि कृष्ण वरा सती |
१०८ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
कचस्तु तं तथेत्युक्त्वा प्रतिजग्राह तद्व्रतम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
७१
देवय़ान्यु उवाच
कचस्य नाशे मम नास्ति शर्म; तवोपघाते जीवितुं नास्मि शक्ता ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
देवय़ान्यु उवाच
कचस्य मार्गं प्रतिपत्स्ये न भोक्ष्ये; प्रिय़ो हि मे तात कचोऽभिरूपः ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
कचाकचि वभौ युद्धं दन्तादन्ति नखानखि |
६० क
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
कचादधीत्य तां विद्यां कृतार्था भरतर्षभ ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
कचोऽभिरूपो दक्षिणं व्राह्मणस्य; शुक्लात्यये पौर्णमास्यामिवेन्दुः ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिच्च निहतामित्रः प्रीणासि सुहृदो नृप |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१८४
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिच्च यक्ष्ये परमप्रतीतः; संय़ुज्य पार्थेन नरर्षभेण |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
कच्चिच्च राजपुत्री ते सपत्नी चैत्रवाहिनी |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिच्च वलमुख्येभ्यः परराष्ट्रे परन्तप |
४९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
धृतराष्ट्र उवाच
कच्चिच्च विषय़े विप्राः स्वकर्मनिरतास्तव |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिच्चापररात्रेषु चिन्तय़स्यर्थमर्थवित् ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिच्चारान्निशि श्रुत्वा तत्कार्यमनुचिन्त्य च |
७४ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिच्छारीरमावाधमौषधैर्निय़मेन वा |
७९ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिच्छुचिकृतः प्राज्ञाः पञ्च पञ्च स्वनुष्ठिताः |
७० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
कच्चिच्छुद्धस्वभावेन श्रिय़ा हीनो न शोचसि ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिच्छृणोषि वृद्धानां धर्मार्थसहिता गिरः |
१०५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिच्छौरे त्वय़ा गत्वा कुरुपाण्डवसद्म तत् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिच्छ्रिय़मिमां प्राप्य न त्वां शोकः प्रवाधते ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
मरुत्त उवाच
कच्चिच्छ्रीमान्देवराजः सुखी च; कच्चिच्चास्मान्प्रीय़ते धूमकेतो |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
कच्चिज्जितेन्द्रिय़ो राजा कच्चिदभ्यन्तरा जिताः |
५१ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिज्ज्ञातीन्गुरून्वृद्धान्दैवतांस्तापसानपि |
९० क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिज्ज्ञातीन्गुरून्वृद्धान्वणिजः शिल्पिनः श्रितान् |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिज्ज्ञानानि ते राजन्प्रसन्नानि यथा पुरा |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वासुदेव उवाच
कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रतिभान्ति च तेऽनघ |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रसन्नानि तवाच्युत ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
युधिष्ठिर उवाच
कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रसन्नानि तवाच्युत ||
१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रसन्नानि तवानघ ||
३ ख