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स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
अगाधवुद्धिः सर्वज्ञो गतिज्ञः सर्वकर्मणाम् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
अगाधवुद्धिर्विदुरश्च माधवं; स्वय़ं च भीमो गजराजविक्रमः ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
अगाधवुद्धिर्विदुरो दीर्घदर्शी; स नो मन्त्री कुशलं तात पृच्छेः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७५
समङ्ग उवाच
अगाधाश्चाप्रतिष्ठाश्च गतिमन्तश्च नारद |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
अगाधे मज्जतस्तस्य द्वीपो भीष्मोऽभवत्तदा ||
४३ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
अगाधे मज्जतां तेषां द्वीपः कर्णोऽभवत्तदा ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
अगाधे मज्जमानानां भीष्मस्त्राताभवत्तदा ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
अगाधे विमले शुद्धे सत्यतोय़े धृतिह्रदे |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
अगाधे सलिले मग्नां नावं दृष्ट्वेव पारगाः |
५२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
अगाधे सुमहाघोरे सर्वभूतभय़ङ्करे ||
२५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
नहुष उवाच
अगाधेऽम्भसि मग्नस्य सामात्यस्य सहर्त्विजः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
अगारदाहिनां ये च ये च गां निघ्नतामपि |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
अगारदाही गरदः कुण्डाशी सोमविक्रय़ी |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
अगारदाही गरदः कुण्डाशी सोमविक्रय़ी |
७ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
अगारनगराणां हि सिद्धिः पुरुषहैतुकी ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
अगारमद्वारमिव प्रविश्य; सङ्कल्पभोगो विषय़ानविन्दन् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
अगाराणां च भेत्तारो नरा निरय़गामिनः ||
६३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
मन उवाच
अगाराणीव शून्यानि शान्तार्चिष इवाग्नय़ः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
अगुणं गुणभोक्तारं यः पश्यति स मुच्यते ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
अगुरुः सारिणां श्रेष्ठो यक्षराक्षसभोगिनाम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
अगूढविभवा यस्य पौरा राष्ट्रनिवासिनः |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
अगृहीतान्यनुस्मृत्य कच्चिन्न कुरुषे व्यथाम् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय १०७
लोमश उवाच
अगृह्णाच्च वरं तस्माद्गङ्गाय़ा धारणं नृप |
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १२४
लोमश उवाच
अगृह्णाच्च्यवनः सोममश्विनोर्देवय़ोस्तदा |
८ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
अगृह्णात्पाणिना पाणिं भीमसेनस्य राक्षसः ||
९३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
अगृह्णीतां च चरणौ मुदितौ पार्थिवस्य तौ ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १७०
मातलिरु उवाच
अगृह्णीतां वरं ते तु सुतानामल्पदुःखताम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
अगृह्यानुनय़ं तस्य मृगेन्द्रस्य स वुद्धिमान् |
८६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
अगोपमिव चोद्भ्रान्तं गोकुलं तद्वलं मम ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
अगोपाः पशवोऽरण्ये वहुभिः श्वापदैरिव ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
अगोपाश्चागता गावः कचस्तात न दृश्यते ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
अगोप्तारश्छलद्रव्या वलिषड्भागतत्पराः |
७८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
नाचिकेत उवाच
अगोमी गोप्रदातॄणां कथं लोकान्निगच्छति ||
३६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
अग्नावग्निमिवाधाय़ द्रोणं हुत्वा हुताशने ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
अग्नावग्निरिव न्यस्तो ज्वालामाली सुदुर्दृशः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
अग्नावेनां परिक्षिप्य याम राष्ट्राणि पार्थिवाः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अग्निं गां व्राह्मणं चैव तथास्याय़ुर्न रिष्यते ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
अग्निं जुह्वन्नुभौ कालावुभौ कालावुपस्पृशन् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
अग्निं तथा तर्पितं खाण्डवे च; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१०४ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निं ते ददृशुस्तत्र स्थितं शैलमिवाग्रतः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
वाय़ुरु उवाच
अग्निं त्वं यजसे नित्यं कस्मादर्जुन व्राह्मणम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
अग्निं दीप्तमिवासीदेद्राजानमुपशिक्षितः ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
अश्व उवाच
अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा जगाम गुरुसद्म तत् ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा पश्यन्कल्याणमग्रतः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा व्राह्मणांश्च जनार्दनः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा व्राह्मणांश्च तपोधनान् |
४९ क
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निं रजस्वला चेत्स्त्री संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अग्निं समिद्धं शमय़ेद्भुजाभ्यां; चन्द्रं च सूर्यं च निवारय़ेत |
६७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २५
भीष्म उवाच
अग्निं समुत्सृजेन्मोहात्तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
अग्निं हुत्वा समुत्पाद्य घोरं वृत्रमुवाच ह |
४३ ख