उद्योग पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
कन्यां प्रवररूपां तां प्राजाय़त नराधिप ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
कन्यां प्राप्स्यसि तां विप्र पुत्रिणी च भविष्यति ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
कन्यां प्रय़ातस्तां राजन्दृष्टवान्विनतात्मजम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
भीष्म उवाच
कन्यां वा जीवितार्थाय़ यः शुल्केन प्रय़च्छति ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
कन्यां शिरस्युपाघ्राय़ प्रविवेश महीतलम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
कन्याः सुमनसश्छागाः स्थापितास्तत्र तत्र ह ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
कन्याः स्वजेथाः सदनेषु सञ्जय़; अनामय़ं मद्वचनेन पृष्ट्वा |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
कन्याकूप उपस्पृश्य वलाकाय़ां कृतोदकः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
कन्यागर्भः पृथुय़शाः पृथाय़ाः पृथुलोचनः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
कन्यातीर्थे नरः स्नात्वा अग्निष्टोमफलं लभेत् ||
९४ ख
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
कन्यातीर्थेऽश्वतीर्थे च गवां तीर्थे च कौरवाः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
कन्यात्वे दूषिते चापि कथं शक्ष्ये द्विजोत्तम |
६२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
कन्यानिमित्तं व्रह्मर्षे तत्रासीदुत्सवो महान् ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
कन्यापरिवृतं दृष्ट्वा भीम सीदति मे मनः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
कन्यापितृत्वात्किञ्चित्तु वक्ष्यामि भरतर्षभ |
७४ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
कन्यापुत्रो मम पुरा द्वैपाय़न इति स्मृतः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
कन्यापुरगतां वालां निपुणां परिरक्षणे ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
कन्याभिः सहितः प्राय़ाद्भारतो भारतान्प्रति ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
कन्यामङ्गिरसे दत्त्वा दिवमाशु जगाम ह ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
८
सूत उवाच
कन्याममरगर्भाभां ज्वलन्तीमिव च श्रिय़ा ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
कन्यामसदृशीं लोके नृपः संवरणस्तदा ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
कन्यारत्नं कुमारांश्च त्रीनुदारान्महाय़शाः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
अष्टावक्र उवाच
कन्यारूपमिहाद्यैव किमिहात्रोत्तरं भवेत् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
कन्यार्थमाह्वय़द्वीरो रथेनैकेन संय़ुगे ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
कन्यावरः पुरा दत्तो मरुद्भिरिति नः श्रुतम् ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
कन्याश्चन्दनचूर्णैश्च लाजैर्माल्यैश्च सर्वशः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
कन्याश्चालङ्कृता दग्ध्वा ततो व्यपगतः स्वय़म् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
कन्यासंवेद्यमासाद्य निय़तो निय़ताशनः |
११७ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
कन्यास्मीति ||
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
कन्याहमभवं विप्र यथा प्राह स मामृषिः ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
विदुर उवाच
कन्याहेतोराङ्गिरसं सुधन्वानमुपाद्रवत् ||
५९ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
कन्याहेतोर्नरश्रेष्ठ भीष्मः शान्तनवस्तदा |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
कन्याय़ां नैव तु पुनर्मम तुल्यावुभौ मतौ ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
युधिष्ठिर उवाच
कन्याय़ां प्राप्तशुल्काय़ां ज्याय़ांश्चेदाव्रजेद्वरः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
कन्याय़ां ये प्रय़च्छन्ति पानमन्नं च भारत |
११८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
युधिष्ठिर उवाच
कन्याय़ाः प्राप्तशुल्काय़ाः पतिश्चेन्नास्ति कश्चन |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
कन्याय़ाः प्राप्तशुल्काय़ाः शुल्कदः प्रशमं गतः ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
कन्याय़ाश्चैव धर्मात्मन्प्रभुर्दानाय़ चेश्वरः ||
८१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
कन्ये विप्रावुपचर देववत्पितृवच्च ह ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
कन्येति पाञ्चालसुतां त्वरमाणोऽभिनिर्ययौ ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११३
नारद उवाच
कन्येय़ं मम राजेन्द्र प्रसवैः कुलवर्धिनी ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
कन्येय़ं मुदिता विप्र काले वचनमव्रवीत् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
कन्यैव तस्य देवस्य प्रसादादमरप्रभम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
५४
सूत उवाच
कन्यैव यमुनाद्वीपे पाण्डवानां पितामहम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
शिखण्ड्यु उवाच
कन्यैवाहं भविष्यामि पुरुषस्त्वं भविष्यसि ||
६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
कपर्दिनं प्रपद्याथ देवदेवमुमापतिम् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
कपर्दिनं वृषावर्तं वृषनाभं वृषध्वजम् |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
कपर्दिने करालाय़ हर्यक्ष्णे वरदाय़ च |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
कपर्दिने करालाय़ हर्यक्ष्णे वरदाय़ च |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
व्यास उवाच
कपर्दिने वराहाय़ एकशृङ्गाय़ धीमते |
९५ क