chevron_left  कपोतवृत्त्याarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
कपोतवृत्त्या पक्षेण व्रीहिद्रोणमुपार्जय़त् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
कपोतवृत्तय़ो नित्यं तान्नमस्यामि यादव ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४५
भीष्म उवाच
कपोतस्य च धर्मिष्ठा गतिः पुण्येन कर्मणा ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
कपोती लुव्धकेनाथ यत्ता वचनमव्रवीत् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
कमण्डलुं जहारास्य मोहय़ित्वा तु भारत ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
कमण्डलुधरो धन्वी वाणहस्तः कपालवान् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
कमण्डलुनिषङ्गाय़ तस्मै व्रह्मात्मने नमः ||
५१ ख
विराट पर्व
अध्याय ५०
अर्जुन उवाच
कमण्डलुर्ध्वजे यस्य शातकुम्भमय़ः शुभः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
कमण्डलुश्चाप्यनु तं महर्षिगणसंवृतः ||
१३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
कमण्डलूंस्तथा स्थालीः पिठराणि च भारत ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय ४५
दुर्योधन उवाच
कमण्डलूनुपादाय़ जातरूपमय़ाञ्शुभान् |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
कमण्डलूनुपादाय़ जातरूपमय़ाञ्शुभान् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
कमभिष्टुवते चाय़ं कं वा क्रोशति किं वदेत् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
कमर्चन्तो महाप्राज्ञ सुखमत्यन्तमाप्नुय़ुः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
कमलदिनकरेन्दुसंनिभैः; सितदशनैः सुमुखाक्षिनासिकैः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
कमलाक्षः पुरुः क्राथी जय़वर्मा सुदर्शनः |
८६ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
कमलैः सोत्पलैस्तत्र भ्राजमानानि सर्वशः |
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७८
नकुल उवाच
कमिवार्थं विवर्तन्तं स्थापय़ेतां न वर्त्मनि ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय २२१
वैशम्पाय़न उवाच
कमुपादाय़ शक्येत गन्तुं कस्यापदुत्तमा |
१० क
विराट पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
कम्पते च यथा भूमिर्नैषोऽन्यः सव्यसाचिनः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
कम्पनां तु समासाद्य नदीं सिद्धनिषेविताम् |
९९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
कम्पनेषु च चापेषु कणपेषु च सर्वशः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
कम्पनैर्भिण्डिपालैश्च रथस्थं पार्थमार्दय़न् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
कम्पन्ते च हसन्ते च नृत्यन्ति च रुदन्ति च ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७
युधिष्ठिर उवाच
कम्पमानं यथा वज्रैः प्रेक्षमाणं शिखण्डिनम् ||
५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
कम्पमानेव कदली वातेनाभिसमीरिता |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
कम्पमानो ज्वरेणेव निःश्वसंश्च मुहुर्मुहुः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
कम्पितः पतते भूमिं पुनश्चैवाधिरोहति |
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
कम्पितः सहसा तेन वाय़ुनाभिप्रवाय़ता ||
५४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
कम्पितात्मा तथा कर्णः शक्त्या चेष्टामदर्शय़त् ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११९
नारद उवाच
कम्पितेनैव मनसा धर्षितः शोकवह्निना ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
कम्पुना च विशल्या च करतोय़ाम्वुवाहिनी ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
कम्पय़न्तश्च सर्वेषामुरगाणां मनांसि ते |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
कम्पय़न्तो भुवं द्यां च क्षोभय़न्तश्च पाण्डवान् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
कम्पय़न्तोऽभ्यवर्तन्त वेगमास्थाय़ मध्यमम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
कम्पय़न्निव घोषेण धनुषो वसुधां वली |
३४ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
कम्पय़न्मेदिनीं पद्भ्यां निर्घात इव पर्वसु |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
कम्पय़न्समरे सेनां पाण्डवानां महावलः ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
कम्पय़ामास सव्येन पाणिना पुरुषोत्तमः ||
१२ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
कम्वलाजिनरत्नानि ग्रामान्क्षेत्रानजाविकम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
कम्वलाजिनरत्नानि स्पर्शवन्ति शुभानि च ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
कम्वलान्विविधांश्चैव द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ३१
सूत उवाच
कम्वलाश्वतरौ चापि नागः कालीय़कस्तथा |
१० क
सभा पर्व
अध्याय ९
नारद उवाच
कम्वलाश्वतरौ नागौ धृतराष्ट्रवलाहकौ |
९ क
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
कम्वुकेय़ूरधारिण्यो निष्ककण्ठ्यः स्वलङ्कृताः ||
४४ ख
सभा पर्व
अध्याय ५४
युधिष्ठिर उवाच
कम्वुकेय़ूरधारिण्यो निष्ककण्ठ्यः स्वलङ्कृताः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३९
वैशम्पाय़न उवाच
कम्वुग्रीवः पुष्कराक्षो भर्ता युक्तो भवेन्मम ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
कम्वुग्रीवः पृथुव्यंसो मत्तवारणविक्रमः |
४ क
विराट पर्व
अध्याय ८
सुदेष्णो उवाच
कम्वुग्रीवा गूढसिरा पूर्णचन्द्रनिभानना ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय १८
द्रौपद्यु उवाच
कम्वुपाणिनमाय़ान्तं दृष्ट्वा सीदति मे मनः ||
१९ ख