सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्कारणिकाः सर्वे सर्वशास्त्रेषु कोविदाः |
२३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्कुन्ती च राजंस्त्वां शुश्रूषुरनहङ्कृता |
६ क
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्कुरूणां सौभ्रात्रमव्युच्छिन्नं भविष्यति ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
कच्चित्कुशलकामासि राज्ञोऽस्य भुजगात्मजे |
२ क
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्कुशलिनो वीरा भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
कच्चित्कुशलिनौ वाहू कच्चिद्वीर्यं तदेव ते ||
१२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्कृतं विजानीषे कर्तारं च प्रशंससि |
१०८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
कच्चित्कृपश्च भोजश्च भय़ार्तौ न न्यवर्तताम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
कच्चित्कृषिकरा राष्ट्रं न जहत्यतिपीडिताः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्कृष्णा द्रौपदी राजपुत्री; सत्यव्रता वीरपत्नी सपुत्रा |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्कोशं च कोष्ठं च वाहनं द्वारमाय़ुधम् |
५७ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्क्रतूनेकचित्तो वाजपेय़ांश्च सर्वशः |
८९ क
वन पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्क्षुद्रः शकुनिर्नाय़ुधानि; जेष्यत्यस्मान्पुनरेवाक्षवत्याम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
कच्चित्क्षेमं तु नृपतेः कच्चिज्जीवति सैन्धवः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
कच्चित्क्षेमं महावाहो तव सैन्यस्य भारत ||
९२ ख
वन पर्व
अध्याय
१११
वेश्यो उवाच
कच्चित्तपो वर्धते तापसानां; पिता च ते कच्चिदहीनतेजाः |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्तव गृहेऽन्नानि स्वादून्यश्नन्ति वै द्विजाः |
८८ क
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्तवापि विदितं यथातथ्येन सारथे ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७२
गन्धर्व उवाच
कच्चित्तातापविघ्नं ते कच्चिन्नन्दसि पुत्रक |
११ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
कच्चित्ताभ्यां कृतं कर्म तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
कच्चित्तीर्णप्रतिज्ञं हि वासुदेवेन रक्षितम् |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
७६
वृहदश्व उवाच
कच्चित्तु नापराधं ते कृतवानस्मि नैषध |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१८४
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्तु पार्थेन यवीय़साद्य; धनुर्गृहीतं निहतं च लक्ष्यम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्ते कुशलं पुत्र स्वाध्याय़तपसोः सदा |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्ते कुशलं विप्र शुभं वा प्रत्युपस्थितम् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्ते कृषितन्त्रेषु गोषु पुष्पफलेषु च |
१०६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
कच्चित्ते गाण्डिवं हस्ते रथे तिष्ठसि चार्जुन |
१२४ क
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्ते गुरवः सर्वे वृद्धा वैद्याश्च पूजिताः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्ते दुर्वलः शत्रुर्वलेनोपनिपीडितः |
८४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्ते नानुतापोऽस्ति वनवासेन भारत |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
धृतराष्ट्र उवाच
कच्चित्ते परितुष्यन्ति शीलेन भरतर्षभ |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्ते पुरुषा राजन्पुरे राष्ट्रे च मानिताः |
१०४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
कच्चित्ते पृथुलश्रोणि नाप्रिय़ं शुभदर्शने |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्ते मन्त्रितो मन्त्रो न राष्ट्रमनुधावति ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्ते यास्यतः शत्रून्पूर्वं यान्ति स्वनुष्ठिताः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
कच्चित्ते वणिजो राष्ट्रे नोद्विजन्ते करार्दिताः |
२२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्ते वर्धते राजंस्तपो मन्दश्रमस्य ते |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्ते सफला दाराः कच्चित्ते सफलं श्रुतम् ||
९९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्ते सफला वेदाः कच्चित्ते सफलं धनम् |
९९ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्ते सर्वविद्यासु गुणतोऽर्चा प्रवर्तते |
८६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
धृतराष्ट्र उवाच
कच्चित्तेषां शरीराणि धक्ष्यन्ति विधिपूर्वकम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
कच्चित्त्वं न तथा प्राज्ञ मत्सरी कोसलाधिप ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्त्वं वर्जय़स्येतान्राजदोषांश्चतुर्दश ||
९८ ख
आदि पर्व
अध्याय
५
शौनक उवाच
कच्चित्त्वमपि तत्सर्वमधीषे लोमहर्षणे ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२०४
वृद्धावू ऊचतुः
कच्चित्त्वमप्यविघ्नेन सम्प्राप्तो भगवन्निह ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्त्वमेव सर्वस्याः पृथिव्याः पृथिवीपते |
४६ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चित्त्वां नावजानन्ति याजकाः पतितं यथा |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
कच्चित्त्वय़ा तस्य सुमन्दवुद्धे; र्गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैर्ज्वलद्भिः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
१११
वेश्यो उवाच
कच्चित्त्वय़ा प्रीय़ते चैव विप्र; कच्चित्स्वाध्याय़ः क्रिय़ते ऋश्यशृङ्ग ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
कच्चित्त्वय़ा सोऽद्य समाश्रय़ोऽस्य; भग्नः पराक्रम्य सुय़ोधनस्य ||
४४ ख