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शान्ति पर्व
अध्याय ६५
इन्द्र उवाच
स मे मान्यश्च पूज्यश्च तत्र क्षत्रं प्रतिष्ठितम् ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
स मे लव्धो दस्युवधाय़ कृष्णो; मन्ये चैतद्विहितं दैवतैर्मे ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सात्यकिरु उवाच
स मे वध्यो भवेच्छत्रुर्यद्यपि स्यान्मुनिव्रतः ||
४४ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
कुन्त्यु उवाच
स मे वरमदात्प्रीतः कृतमित्यहमव्रुवम् |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ३९
शिशुपाल उवाच
स मे वहुमतो राजा जरासन्धो महावलः |
१ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
स मे विमुञ्चतु प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
उत्तङ्क उवाच
स मे वुद्धिं प्रय़च्छस्व समां वुद्धिमतां वर ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
स मे समाश्लिष्य पुनः शरीरं; जटासु गृह्याभ्यवनाम्य वक्त्रम् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
स मेघनिनदो हर्षाद्विनदन्निव गोवृषः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
स मेघनिनदो हर्षान्नदन्निव च गोवृषः |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
स मेघसमनिर्घोषस्तप्तकाञ्चनसप्रभः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
स मेघसमनिर्घोषो महाञ्शव्दोऽस्पृशद्दिवम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
स मेरुकूटादात्मानं मुमोच भगवानृषिः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
स मेरुमनुवृत्तः सन्पुनर्गच्छति पाण्डव |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
स मेऽभिचारसंय़ुक्तमाचष्ट भगवान्वरम् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय २७८
नारद उवाच
स मैत्रः सोऽनसूय़श्च स ह्रीमान्धृतिमांश्च सः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
स मैत्रजनसन्तुष्ट इह प्रेत्य च नन्दति ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
स मोक्षमनुचिन्त्यैव शुकः पितरमभ्यगात् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
स मोक्ष्यति रणे तेजः पुत्रेषु मम सञ्जय़ ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
स मोघं कृतमात्मानं दृष्ट्वा पार्थेन कौरवः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
स मोघं तस्य वाणौघं कृत्वा वानरकेतनः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
स मोचय़ति पुण्यात्मा शरण्यः शरणागतान् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
स मोचय़ति सुप्रीतः शरण्यः शरणागतान् ||
७१ ख
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
स मोचय़ित्वा तानश्वान्परिचार्य च शास्त्रतः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
स मोदेत्स्वर्गलोकस्थ एवमाहुर्मनीषिणः |
५७ ख
वन पर्व
अध्याय २५६
वैशम्पाय़न उवाच
स मोहमगमद्राजा प्रहारवरपीडितः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
स मोहमनुसम्प्राप्तो ध्वजय़ष्टिं समाश्रितः ||
३० ग
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
स मोहवशमापन्नः क्रूरं कर्म निषेवते ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
स मोहान्निरय़ं याति तत्र गत्वानुशोचति ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ११
डुण्डुभ उवाच
स मय़ा क्रीडता वाल्ये कृत्वा तार्णमथोरगम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
स मय़ा गच्छता मार्गे विनिकीर्णो भय़ावहः |
७३ क
वन पर्व
अध्याय २९६
सहदेव उवाच
स मय़ा न हतस्तत्र तेन प्राप्ताः स्म संशय़म् ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
कुन्त्यु उवाच
स मय़ा मूढय़ा पुत्रो ज्ञाय़मानोऽप्युपेक्षितः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
स मय़ा राज्यकामेन हन्यमानोऽप्युपेक्षितः |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७
युधिष्ठिर उवाच
स मय़ा राज्यलुव्धेन गाङ्गेय़ो विनिपातितः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७
युधिष्ठिर उवाच
स मय़ा राज्यलुव्धेन पापेन गुरुघातिना |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ७८
शर्मिष्ठो उवाच
स मय़ा वरदः कामं याचितो धर्मसंहितम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
शल्मलिरु उवाच
स मय़ा वहुशो भग्नः प्रभञ्जन्वै प्रभञ्जनः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
स मय़ा समनुप्राप्तो नास्मि शोच्यः कथञ्चन |
२९ क
वन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
स मय़ा सागरावर्ते दृष्ट आसीत्परीप्सता ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय ४५
दुर्योधन उवाच
स मय़ि त्वं मृते राजन्विदुरेण सुखी भव |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
स मय़ैतानि वाक्यानि श्रावितः शोकलालसः |
४० क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
स यक्षगन्धर्वसुरव्रह्मर्षिगणसेवितम् |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
स यक्ष्मणाभिभूतात्माक्षीय़ताहरहः शशी |
५६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
स यक्ष्यमाणो धर्मात्मा शातकुम्भमय़ान्युत |
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ५३
सूत उवाच
स यज्ञः पाण्डवेय़स्य राज्ञः पारिक्षितस्य ह |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
स यज्ञः शुशुभे तस्य साक्षाद्देवर्षिसङ्कुलः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
स यज्ञः सर्वभूतानामास्यं तस्य हुताशनः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
भीष्म उवाच
स यज्ञकारः कौन्तेय़ पित्रा सृष्टः परन्तप |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
स यज्ञशीलः प्रजने निविष्टः; प्राग्व्रह्मचारी प्रविभक्तपक्षः |
५५ क