कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
जय़ाशा धार्तराष्ट्राणां वैरस्य च मुखं यतः |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
धृतराष्ट्र उवाच
जय़ाशा यत्र मन्दस्य पुत्रस्य मम संय़ुगे |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
जय़ाशां तव पुत्राणां सम्भग्नां शर्म वर्म च ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
जय़ाशिषः प्रहृष्टानां नराणां पथि पाण्डवः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
जय़ाशीर्भिर्द्विजेन्द्रैस्तु स्तूय़मानोऽधिराजवत् |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
जय़ाय़ पाण्डुपुत्राणां यत्तस्तस्थौ रणाजिरे ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
जय़ाय़ पाण्डुपुत्राणां समाजग्मुर्महीक्षितः ||
८४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
जय़िनं सुहृदस्तात वन्दनैर्मङ्गलेन च ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
जय़े निराशः पुत्राणां धृतराष्ट्रोऽपतत्क्षितौ ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
जय़े स्याद्विपुला कीर्तिर्ध्रुवः स्वर्गः पराजय़े ||
१४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
जय़ेच्च मृत्युं योगेन तत्परेणान्तरात्मना ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
जय़ेति वाचो मुमुचुः संस्तुवन्तो मुदान्विताः ||
११८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
जय़ेत्कदर्यं दानेन जय़ेत्सत्येन चानृतम् ||
५८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१४
भीम उवाच
जय़ेत्सम्यङ्नय़ो राजन्नीत्यार्थानात्मनो हितान् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५९
गन्धर्व उवाच
जय़ेदव्राह्मणः कश्चिद्भूमिं भूमिपतिः क्वचित् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
जय़ेदेतान्रणे को नु शक्रतुल्यवलोऽप्यरिः ||
५५ ख
सभा पर्व
अध्याय
१४
कृष्ण उवाच
जय़ेद्यश्च जरासन्धं स सम्राण्निय़तं भवेत् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
जय़ेनाद्भुतकल्पेन देवदेवमथार्चय़न् ||
६३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५९
गन्धर्व उवाच
जय़ेन्नक्तञ्चरान्सर्वान्स पुरोहितधूर्गतः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
जय़ेप्सवः स्वर्गमनाय़ चोत्सुकाः; पतन्ति नागाश्वरथाः परन्तप |
६८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
जय़ेय़ं च महाराज अनुज्ञातस्त्वय़ा रिपून् ||
७३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
जय़ेय़ं च रिपून्सर्वाननुज्ञातस्त्वय़ा द्विज ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
जय़ेय़ं च रिपून्सर्वाननुज्ञातस्त्वय़ानघ ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय
२९८
युधिष्ठिर उवाच
जय़ेय़ं लोभमोहौ च क्रोधं चाहं सदा विभो |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
जय़ैषी पाण्डुपुत्राणामिदं वचनमव्रवीत् ||
१०८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
जय़ो जेता स्थितः सत्ये पारय़िष्यन्महाव्रतम् ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
जय़ो जय़न्तो विजय़ो जय़त्सेनो जय़द्वलः |
३० क
विराट पर्व
अध्याय
२२
द्रौपद्यु उवाच
जय़ो जय़न्तो विजय़ो जय़त्सेनो जय़द्वलः |
१२ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
जय़ो नामेतिहासोऽय़ं श्रोतव्यो भूतिमिच्छता |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
कुन्त्यु उवाच
जय़ो नामेतिहासोऽय़ं श्रोतव्यो विजिगीषुणा |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
जय़ो नामेतिहासोऽय़ं श्रोतव्यो विजिगीषुणा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
जय़ो भवति कौरव्य तदा तद्विद्धि मे वचः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
जय़ो वधो वा सङ्ग्रामे धात्रा दिष्टः सनातनः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
जय़ो वापि वधो वापि युध्यमानस्य संय़ुगे |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
जय़ो वास्तु वधो वा मे कथं वा कृष्ण मन्यसे ||
८९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
जय़ो वास्तु वधो वेति कृतवुद्धिर्महारथः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
जय़ो विशालो वरदः शीघ्रगः प्राणधारणः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
जय़ो वैरं प्रसृजति दुःखमास्ते पराजितः |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
जय़ोदरं पृथिव्या ते श्रेय़ो निर्जितय़ा जितम् ||
५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
जय़ोन्मत्तेन भीमश्च वह्ववद्धं प्रभाषता ||
३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
युधिष्ठिर उवाच
जय़ोपाय़ं व्रवीहि त्वमात्मनः समरे परैः ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
जय़ोऽस्तु पाण्डुपुत्राणामित्यूचतुररिन्दमौ |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
जय़ोऽस्मि व्यवसाय़ोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ||
३६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
जय़ोऽय़मजय़ाकारो जय़स्तस्मात्पराजय़ः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
जय़ोऽय़मजय़ाकारो भगवन्प्रतिभाति मे ||
१५ ख