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उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
कर्तास्मि निग्रहं तस्येत्युवाच स पुनः पुनः ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
कर्तास्मि मिषतां वोऽद्य ततो द्रक्ष्यथ मे वलम् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
कर्तास्मि समरे कर्म धार्तराष्ट्र हितं तव ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
कर्तास्म्येतत्सत्पुरुषार्यकर्म; त्यक्त्वा प्राणाननुय़ास्यामि भीष्मम् |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
युधिष्ठिर उवाच
कर्तास्म्येतन्महीपाल निर्वृतो भव भारत ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
कर्ताहं कर्मणस्तस्य कुरु कार्याणि सर्वशः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४२
व्राह्मण उवाच
कर्तुं काङ्क्षामि नेच्छामि वद्धः साधारणैर्गुणैः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
तक्षो उवाच
कर्तुं चाहं न शक्ष्यामि कर्म सद्भिर्विगर्हितम् ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ||
६० ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
कर्तुं यस्य न शक्येत क्षय़ो वर्षशतैरपि ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
कर्तुं यो यत्स तत्कर्म व्रवीतु कुरुनन्दनाः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३९
युधिष्ठिर उवाच
कर्तुं वा कृतपूर्वा वा तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
कर्तुं शतपथं वेदमपूर्वं कारितं च मे |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
कर्तुकामा सुखवहे शकले सा तु राक्षसी |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
कर्तुमर्हति तद्राजा भवांश्चाप्यनुमन्यताम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
कर्तुमर्हसि कल्याण तदृतं पार्थिवर्षभ ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १८७
द्रुपद उवाच
कर्तुमर्हसि कौन्तेय़ कस्मात्ते वुद्धिरीदृशी ||
२७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
नारद उवाच
कर्तुमर्हसि कौरव्य तेषां त्वमुदकक्रिय़ाम् |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
कर्तुमर्हसि धर्मज्ञ दय़ां मय़ि कुरूद्वह |
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २०६
व्राह्मण उवाच
कर्तुमर्हसि नोत्कण्ठां त्वद्विधा ह्यविषादिनः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १८८
धृष्टद्युम्न उवाच
कर्तुमस्मद्विधैर्व्रह्मंस्ततो न व्यवसाम्यहम् |
१२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
कर्तुमारभते प्रीतो मरणादिषु कर्मसु ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
कर्तुमाश्रमदृष्टांश्च धर्मांस्ताञ्शृणु पाण्डव ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
कर्तुमुत्सहते लोके दृष्ट्वा सम्प्रस्थितं जगत् ||
९१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
कर्तृत्वाच्चापि तत्त्वानां तत्त्वधर्मी तथोच्यते |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
कर्तृत्वाच्चापि वीजानां वीजधर्मी तथोच्यते ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
कर्तृत्वाच्चैव योनीनां योनिधर्मा तथोच्यते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
कर्तृत्वात्प्रकृतीनां तु तथा प्रकृतिधर्मिता |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
कर्तृत्वात्प्रलय़ानां च तथा प्रलय़धर्मिता ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
कर्तृत्वादेव पुरुषः कर्मसिद्धौ प्रशस्यते |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
कर्दमश्चापि यः प्रोक्तः क्रोधो विक्रीत एव च ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
कर्दमस्तस्य च सुतः सोऽप्यतप्यन्महत्तपः ||
९६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
कर्पासमृदवः केचित्तथान्ये मकरस्पृशः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
कर्म कारय़ितुं चैव भृतानप्यभृतांस्तथा ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
कर्म कारय़िथाः शूर तत्र किं विदुरोऽव्रवीत् ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
कर्म कृत्वा रणे शूर ततः कत्थितुमर्हसि ||
५३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
ऋषय़ ऊचुः
कर्म केचित्प्रशंसन्ति प्रशान्तिमपि चापरे |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
कर्म केचित्प्रशंसन्ति मन्दवुद्धितरा नराः |
३० क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
कर्म खल्विह कर्तव्यं जातेनामित्रकर्शन |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
कर्म चात्महितं कार्यं तीक्ष्णं वा यदि वा मृदु |
७९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेतसम् ||
३३ ख
विराट पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
कर्म चेच्छामि वै कर्तुं तस्य यो मां पुपुक्षति ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
कर्म चेच्छाम्यहं कर्तुं तस्य यो मां पुपुक्षति ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
कर्म चेत्किञ्चिदन्यत्स्यादितरन्न समाचरेत् |
४२ क
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
कर्म चेत्कृतमन्वेति कर्तारं नान्यमृच्छति |
४१ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
कर्म चैतदसाधूनां वृजिनानामसाधुवत् |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
कर्म चैतदसाधूनामसाधुं साधुना जय़ेत् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
कर्म चैतद्विलिङ्गस्य किं वाद्य प्रसमीक्षितम् |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
कर्म चैव तदर्थीय़ं सदित्येवाभिधीय़ते ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
कर्म चैव हि जातिश्च विशेषं तु निशामय़ ||
३२ ख