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शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
कर्म तत्कुरुते तर्षादहङ्कारपरिग्रहम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
कर्म तद्दूषय़त्येनं तस्मात्कर्म नशोभनम् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
कर्म त्वेके प्रशंसन्ति स्वल्पवुद्धितरा नराः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११९
व्यास उवाच
कर्म भूमिकृतं देवा भुञ्जते तिर्यगाश्च ये |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
कर्म यच्छुभमेवेह सद्भिराचरितं च यत् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
कर्म वा क्रिय़तां गुरुशुश्रूषा वेति |
८४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
कर्म वै सफलं कृत्वा गुरूणां प्रतिपादय़ेत् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
कर्म व्रह्मोद्भवं विद्धि व्रह्माक्षरसमुद्भवम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
कर्म शूद्रे कृषिर्वैश्ये दण्डनीतिश्च राजनि |
४ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
कर्म शूद्रे कृषिर्वैश्ये सङ्ग्रामः क्षत्रिय़े स्मृतः |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
कर्म सत्यं तपोऽर्थश्च विहितास्तत्र रश्मय़ः |
७५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
कर्म सत्यानृते चोभे त्वमेवास्ति च नास्ति च ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मकाले ग्रहीष्यामि स्वस्ति तेऽस्त्विति चाव्रवीत् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
कर्मकाले पुनर्देहमनुचिन्त्य सृजाम्यहम् |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
कर्मक्षय़ाच्च ते सर्वे च्यवन्ते वै पुनः पुनः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
कर्मगर्भैर्गुणैर्देही गर्भे तदुपपद्यते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
कर्मजं त्विह मन्येऽहं फलय़ोगं शुभाशुभम् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
कर्मजं वुद्धिय़ुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः |
५१ क
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
कर्मजा हि मनुष्याणां रोगा नास्त्यत्र संशय़ः |
१४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४२
सूत उवाच
कर्मजानि शरीराणि तथैवाकृतय़ो नृप ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
कर्मजान्येव मौद्गल्य न मातृपितृजान्युत ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
कर्मजैर्वन्धनैर्वद्धास्तद्वद्योगाः परन्तप |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
कर्मजोऽय़ं पृथग्भावो द्वन्द्वय़ुक्तो विय़ोगिनः |
५९ क
वन पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मणः पुरुषः कर्ता शुभस्याप्यशुभस्य च |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
कर्मणः पृथिवीपाल नृशंसोऽनृतवागपि |
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
कर्मणः पृथिवीपाल मम येन दुरात्मना |
१९२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
कर्मणः फलनिर्वृत्तिं स्वय़मश्नाति कारकः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
कर्मणः फलमाप्नोति सुखदुःखे भवाभवौ |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
कर्मणः शक्यते गन्तुं हृषीकेशस्य सञ्जय़ ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मणस्तद्विधत्स्वेह येन शुध्यति मे मनः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
कर्मणस्तस्य घोरस्य वहुधा निर्णय़ो भवेत् ||
१७ ग
आदि पर्व
अध्याय १०१
धर्म उवाच
कर्मणस्तस्य ते प्राप्तं फलमेतत्तपोधन ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
कर्मणा कालय़ुक्तेन तथेदं भ्राम्यते जगत् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
कर्मणा कालय़ुक्तेन संसारपरिवर्तकम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
उमो उवाच
कर्मणा केन भगवन्प्राप्नुवन्ति महाफलम् ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय ८१
जनमेजय़ उवाच
कर्मणा केन स दिवं पुनः प्राप्तो महीपतिः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११८
नारद उवाच
कर्मणा केन सिद्धोऽय़ं क्व वानेन तपश्चितम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९९
नारद उवाच
कर्मणा क्षत्रिय़ाश्चैते निर्घृणा भोगिभोजिनः |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
कर्मणा जाय़ते जन्तुर्मूर्तिमान्षोडशात्मकः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
कर्मणा जाय़ते प्रेत्य मूर्तिमान्षोडशात्मकः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
कर्मणा तेन कौरव्य चिरकारितय़ा तय़ा ||
६९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
कर्मणा तेन कौरव्य तपसा विपुलेन च ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
कीट उवाच
कर्मणा तेन चैवाहं सुखाशामिह लक्षय़े |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
अर्जुन उवाच
कर्मणा तेन पापेन पतेथा निरय़े ध्रुवम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
कर्मणा तेन पापेन लिप्यते नूनमीश्वरः ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
कर्मणा तेन पार्थस्य तुतुषुर्देवदानवाः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
कर्मणा तेन पार्थस्य शक्रष्येव विकुर्वतः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
कर्मणा तेन समरे तव पुत्रस्य धन्विनः |
९० क