chevron_left  कच्चित्पदंarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १८४
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्पदं मूर्ध्नि न मे निदिग्धं; कच्चिन्माला पतिता न श्मशाने ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७०
भीष्म उवाच
कच्चित्पराजितस्याद्य न व्यथा तेऽस्ति दानव ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्पाण्डुसुताः पञ्च धृतराष्ट्रस्य चात्मजाः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
कच्चित्पुत्रा जीवपुत्राः सुसम्य; ग्वर्तन्ते वो वृत्तिमनृशंसरूपाम् |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय ५२
युधिष्ठिर उवाच
कच्चित्पुत्राः स्थविरस्यानुलोमा; वशानुगाश्चापि विशोऽपि कच्चित् ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चित्पुरुषकारेण पुरुषः कर्म शोभय़न् |
४२ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चित्पौरा न सहिता ये च ते राष्ट्रवासिनः |
८३ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चित्प्रकृतय़ः षट्ते न लुप्ता भरतर्षभ |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
कच्चित्प्रकृतय़ः सर्वा भजन्ते त्वां यथा पुरा ||
३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
कच्चित्प्रमथ्य शिविरं हत्वा सोमकपाण्डवान् |
३ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चित्प्राणांस्तवार्थेषु सन्त्यजन्ति सदा युधि ||
४० ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चित्प्राणांस्त्वदर्थेषु सन्त्यजन्ति त्वय़ा हृताः ||
८५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
कच्चित्प्रिय़ं मे परमं त्वय़ाद्य; कृतं रणे सूतपुत्रं निहत्य ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
कच्चित्स कदनं कृत्वा परेषां पाण्डुनन्दन |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्स कुशली कृष्ण वत्सो मम सुखैधितः ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
धृतराष्ट्र उवाच
कच्चित्स राजा कुशली सपुत्रः; सहामात्यः सानुजः कौरवाणाम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
कच्चित्स सैन्धवं सङ्ख्ये हनिष्यति धनञ्जय़ः ||
४२ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
कच्चित्सङ्ग्रामे विदितो वा तदाय़ं; समागमः सृञ्जय़कौरवाणाम् |
४१ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चित्सन्धिं यथाकालं विग्रहं चोपसेवसे |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १५७
जनमेजय़ उवाच
कच्चित्समागमस्तेषामासीद्वैश्रवणेन च |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
कच्चित्समागम्य धनुःप्रमुक्तै; स्त्वत्प्रेषितैर्लोहितार्थैर्विहङ्गैः |
३६ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चित्सर्वेऽनुरक्तास्त्वां कुलपुत्राः प्रधानतः |
४० क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चित्सर्वेऽनुरक्तास्त्वां भूमिपालाः प्रधानतः |
८५ क
आदि पर्व
अध्याय १८४
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्सवर्णप्रवरो मनुष्य; उद्रिक्तवर्णोऽप्युत वेह कच्चित् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चित्सहस्रैर्मूर्खाणामेकं क्रीणासि पण्डितम् |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
इन्द्र उवाच
कच्चित्सुखं स्वपिषि त्वं वृहस्पते; कच्चिन्मनोज्ञाः परिचारकास्ते |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वासुदेव उवाच
कच्चित्सुखेन रजनी व्युष्टा ते राजसत्तम |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १६३
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चित्सुराधिपः प्रीतो रुद्रश्चास्त्राण्यदात्तव ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चित्सूत्राणि सर्वाणि गृह्णासि भरतर्षभ |
१०९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
कच्चित्सैन्धवको राजा दुर्योधनहिते रतः |
४४ क
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
कच्चित्सौते न ते मोहः शाल्वं दृष्ट्वा महाहवे |
६ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चित्स्त्रिय़ः सान्त्वय़सि कच्चित्ताश्च सुरक्षिताः |
७३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
धृतराष्ट्र उवाच
कच्चित्स्त्रीवालवृद्धं ते न शोचति न याचते |
८ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चित्स्वनुष्ठिता तात वार्त्ता ते साधुभिर्जनैः |
६९ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चित्स्वपरराष्ट्रेषु वहवोऽधिकृतास्तव |
५५ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदग्निभय़ाच्चैव सर्पव्यालभय़ात्तथा |
११२ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदग्निषु ते युक्तो विधिज्ञो मतिमानृजुः |
३० क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदङ्गेषु निष्णातो ज्योतिषां प्रतिपादकः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय़ ||
७२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
कच्चिदद्य शरीरं ते भूमौ न परितप्यते ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदन्धांश्च मूकांश्च पङ्गून्व्यङ्गानवान्धवान् |
११३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
धृतराष्ट्र उवाच
कच्चिदन्यं समारूढः स रथं सात्यकिः पुनः ||
७५ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदभ्यवहार्याणि गात्रसंस्पर्शकानि च |
५६ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदभ्यस्यते शश्वद्गृहे ते भरतर्षभ |
११० क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदभ्यागता दूराद्वणिजो लाभकारणात् |
१०३ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदर्थं च धर्मं च कामं च जय़तां वर |
१० क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदर्थान्विनिश्चित्य लघुमूलान्महोदय़ान् |
२० क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदर्थाश्च कल्पन्ते धर्मे च रमते मनः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदर्थेन वा धर्मं धर्मेणार्थमथापि वा |
९ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदर्थेषु सम्प्रौढान्हितकामाननुप्रिय़ान् |
६३ क