भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
कर्मेन्द्रिय़ाणि संय़म्य य आस्ते मनसा स्मरन् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
कर्मेन्द्रिय़ैः कर्मय़ोगमसक्तः स विशिष्यते ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
कर्मैतद्वै न सदृशं भवतः प्रतिभाति मे |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
कर्मैव पुरुषस्याह शुभं वा यदि वाशुभम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
कर्मोत्कर्षं न मार्गेत परेषां परिनिन्दय़ा |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
कर्मोदय़ं सुखमाशंसमानः; कृच्छ्रोपाय़ं तत्त्वतः कर्म दुःखम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
कर्मोदय़े कर्मफलानुरागा; स्तत्रानु यान्ति न तरन्ति मृत्युम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
कर्मय़ुक्तान्प्रशंसन्ति सात्त्विकानितरांस्तथा ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
कर्वुराः शितिपादास्तु स्वर्णजालपरिच्छदाः |
४१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
कर्शनं भीषणं चैव युद्धे चापि वहुक्षय़म् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
कर्शनार्थो हि यो धर्मो मित्राणामात्मनस्तथा |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
कर्शितां सुव्रताचारे क्षुधाविह्वलचेतसम् ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
कर्शय़न्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
कर्शय़ामः स्वमित्राणि नन्दय़ामश्च शात्रवान् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
कर्षकस्याचरन्विघ्नं भगवान्पाकशासनः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
गौतम उवाच
कर्षको मत्सरी चास्तु यस्ते हरति पुष्करम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
विश्वामित्र उवाच
कर्षको मत्सरी चास्तु विसस्तैन्यं करोति यः ||
६८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
कर्षन्ती तौ ततस्ते तां दृष्ट्वा संन्यपतन्भुवि ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
कर्षन्तु भुवि संहृष्टा निहतस्य मय़ा मृधे ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
कर्षन्तो लाङ्गलैः पुंसो घ्नन्ति भूमिशय़ान्वहून् |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
कलत्रमादितः कृत्वा नश्येत्स्वं स्वय़मेव हि |
२९ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
कलत्रस्य वहुत्वात्तु सम्पतत्सु ततस्ततः |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
कललादर्वुदोत्पत्तिः पेशी चाप्यर्वुदोद्भवा |
११७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
कलविङ्का विनिष्पेतुस्तेनास्य भरतर्षभ ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
कलशं जलपूर्णं वै गृहीत्वा जनमेजय़ ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
कलशं पूर्णमादाय़ राज्ञोऽन्तिकमुपागमत् ||
३७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
कलशान्काञ्चनान्राजंस्तथैवौदुम्वरानपि ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१००
लोमश उवाच
कलशैर्विप्रविद्धैश्च स्रुवैर्भग्नैस्तथैव च |
१० क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
कलश्यां चाप्युपस्पृश्य श्रद्दधानो जितेन्द्रिय़ः |
६६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
कलश्यां वाप्युपस्पृश्य वेद्यां च वहुशोजलाम् |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
कलहंसगणैर्जुष्टामृषिकिंनरसेविताम् ||
८५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
कलहंसविनिर्घोषैर्नूपुराणां च निस्वनैः |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
कला काष्ठा मुहूर्ताश्च पक्षा मासा ऋतुस्तथा ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
कला काष्ठा लवो मात्रा मुहूर्तोऽहः क्षपाः क्षणाः ||
१३८ ख
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
कलांशास्तात युज्यन्ते मुहूर्ताश्च दिनानि च |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
कलाः काष्ठा मुहूर्ताश्च दिना नाड्यः क्षणा लवाः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
श्रीभगवानु उवाच
कलाः पञ्चदश त्यक्त्वा ते मुक्ता इति निश्चय़ः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
कलाः पञ्चदशा योनिस्तद्धाम इति पठ्यते |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
कलानां पृथगर्थानां प्रतिभेदः क्षणे क्षणे |
१२१ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
कलापरचिताटोपान्विचित्रमुकुटानिव |
५६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
कलापिनश्चापहस्ता दीर्घकेशाः प्रिय़ाहवाः |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
कलापो ह्येष तस्यासीन्माद्रीपुत्रस्य धीमतः ||
५१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
कलाभिस्तिसृभी राजन्यथाविधि मनस्विनीम् ||
२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
शल्मलिरु उवाच
कलामष्टादशीं प्राणैर्न मे प्राप्नोति मारुतः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
कलावधर्मो भूय़िष्ठं धर्मो भवति तु क्वचित् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
कलाय़पुष्पवर्णास्तु श्वेतलोहितराजय़ः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
कलाय़ां जाय़तेऽजस्रं पुनः पुनरवुद्धिमान् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
कलाय़ानथ मुद्गांश्च गोधूमानतसीस्तथा ||
६२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
व्यास उवाच
कलिं दुर्योधनं विद्धि शकुनिं द्वापरं तथा |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
कलिं पुत्रप्रवादेन सञ्जय़ त्वामजीजनम् ||
२७ ख