भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
कवचैः शोणितादिग्धैर्विप्रकीर्णैश्च काञ्चनैः |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
कवचोडुपसंय़ुक्तां मांसपङ्कसमाकुलाम् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
कवचोपहितैर्गात्रैर्हस्तैश्च समलङ्कृतैः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
कवचोर्मिध्वजावर्तां मर्त्यकूलापहारिणीम् |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
कवचोष्णीषफेनाढ्या धनुर्द्वीपासिकच्छपा ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
कवचोष्णीषसञ्छन्ना पताकारुचिरद्रुमा |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
कवन्धं मेघसङ्काशं भानुमावृत्य संस्थितम् ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
कवन्धशतसङ्कीर्णं छत्रचामरशोभितम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
कवन्धान्तर्हितो भानुरुदय़ास्तमय़े तदा ||
७५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
कवन्धान्युत्थितानि स्म शतशोऽथ सहस्रशः ||
६७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
कवन्धैः शोणितादिग्धैश्छिन्नगात्रशिरोधरैः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
कवन्धैः संवृतं सर्वं ताम्राभ्रैः खमिवावृतम् ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
कवन्धैरुत्थितैश्छिन्नैर्नृत्यद्भिश्चापरैर्युधि |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
कविं तात भृगुं चैव तस्मात्तौ वारुणौ स्मृतौ ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
कविं पुराणमनुशासितार; मणोरणीय़ांसमनुस्मरेद्यः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
कविः काव्यश्च विष्णुश्च वुद्धिमानुशनास्तथा |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
धृतराष्ट्र उवाच
कवे तन्मे व्रूहि सर्वं यथाव; न्मनीषितं सर्वमजातशत्रोः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
कव्यप्रदाने तु वुधाः परीक्ष्यं व्राह्मणं विदुः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
कव्यानि ज्ञाननिष्ठेभ्यः प्रतिष्ठाप्यानि भारत |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
प्रह्राद उवाच
कव्यानि वदतां तात संय़च्छामि वहामि च ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
कशाग्रदण्डाभिहता काल्यमाना ततस्ततः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
कशादण्डप्रतिहता काल्यमाना ततस्ततः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
कशापार्ष्ण्यभिघातैश्च वाग्भिरुग्राभिरेव च ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
कशाप्रहाराभिहतस्ततः स मुनिसत्तमः |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
कशेरको गण्डकण्डुः प्रद्योतश्च महावलः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
कश्च जातु कुले जातः क्षत्रधर्मेण वर्तय़न् |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
कश्च तां क्रोधदीप्ताक्षीं पुत्रव्यसनकर्शिताम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
कश्च धर्मः परो लोके कश्च धर्मः सदाफलः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
युधिष्ठिर उवाच
कश्च पूर्वापरमिदं जागर्ति परिपालय़न् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
युधिष्ठिर उवाच
कश्च विज्ञाय़ते पूर्वं कोऽपरो दण्डसञ्ज्ञितः |
७ ख
वन पर्व
अध्याय
५५
वृहदश्व उवाच
कश्च सर्वगुणोपेतं नाश्रय़ेत नलं नृपम् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
कश्चान्यो ज्ञातिभार्यां वै विप्रकर्तुं तथार्हति |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
कुशिक उवाच
कश्चासौ भविता वन्धुर्मम कश्चापि संमतः ||
३५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
कश्चासौ व्राह्मणश्रेष्ठस्तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय
१७७
वैशम्पाय़न उवाच
कश्चाय़ं पर्वताभोगप्रतिमः पन्नगोत्तमः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०६
वैशम्पाय़न उवाच
कश्चाय़ं सुभगो देशः का च त्वं कस्य चात्मजा ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
कश्चिच्च कृतकः पुत्रः सङ्ग्रहादेव लक्ष्यते |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
कश्चिच्छाकुनिकस्तात पूर्वेषामिति शुश्रुम ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
१४
युधिष्ठिर उवाच
कश्चित्कदाचिदेतेषां भवेच्छ्रेष्ठो जनार्दन ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
कश्चित्कर्माणि कुर्वन्हि न प्राप्यमधिगच्छति ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
कश्चित्कर्मानुसृत्यान्यो न प्राप्यमधिगच्छति ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
कश्चित्क्रीडितुकामो वै भोक्तुकामस्तथापरः |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
कश्चित्क्षुद्रसमाचारः पृथिव्यां कालसंमतः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
कश्चित्खड्गं विनिष्कृष्य भुजेनोद्यम्य तिष्ठति ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
कश्चित्तरति काष्ठेन सुगम्भीरां महानदीम् |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
नीलकण्ठ उवाच
कश्चित्तव रुजं कर्ता मत्प्रसादात्कथञ्चन |
७८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
कश्चित्तु वुद्धिसम्पन्नो व्राह्मणो विजने वने |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
युधिष्ठिर उवाच
कश्चित्तु संशय़ो मेऽस्ति तन्मे व्रूहि पितामह |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१२
वासुदेव उवाच
कश्चित्सुखे वर्तमानो दुःखस्य स्मर्तुमिच्छति ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
कश्चित्सुखे वर्तमानो दुःखस्य स्मर्तुमिच्छति |
१४ क