भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
स्वर्भानुः कौरवश्रेष्ठ यावदेष प्रभावतः ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्भानुरश्वोऽश्वपतिर्वृषपर्वाजकस्तथा |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्भानुरिति विख्यातः श्रीमान्यस्तु महासुरः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२९१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्भानुशत्रुर्योगात्मा नाभ्यां पस्पर्श चैव ताम् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
स्वर्भानोः सूर्यकल्पस्य सोमसूर्यौ जिघांसतः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
स्वर्यातेऽहं पितरि तं स्वराज्ये संन्यवेशय़म् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७१
शक्र उवाच
स्वर्लोकवासिनां लक्ष्मीमभिभूय़ स्वय़ा त्विषा |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
स्वर्लोके राजराज्येन सोऽभिषिच्येत भार्गव ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
स्वलङ्कृतं क्षितौ क्षुण्णं चेष्टमानं यथोरगम् |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
स्वलङ्कृतमिदं वेश्म स्थूणस्यामितविक्रमाः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वलङ्कृता सुप्रय़ता भर्तुः प्रिय़हिते रता ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
स्वलङ्कृतांस्तथा प्रेष्यानिच्छञ्जीवितमात्मनः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
स्वलङ्कृताः शुभाः कन्या दधिसर्पिर्मधूदकम् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
स्वलङ्कृताश्च कल्याण्यः पादैरेव सहस्रशः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्राय़ते महतो भय़ात् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
स्वल्पस्य वा महतो वापि वृद्धौ; धनस्यैतान्यष्ट समिन्धनानि ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
स्वल्पाप्यर्थाः प्रशस्यन्ते धर्मस्यार्थे महाफलाः ||
१ ग
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
स्ववंशमुद्धरेद्राजन्स्नात्वा वै वंशमूलके ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
स्ववर्णमन्यवर्णं वा स्वशीलं शास्ति निश्चय़े ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
स्ववर्त्मनि स्थितं वीर जपहोमेषु वर्तते ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
स्ववर्त्मनि स्थितश्चैव गरीय़ानेष जाजले ||
१६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
स्ववलं च भय़ात्तस्य प्राय़शो विमुखीकृतम् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
स्ववलेन वृतो राजञ्जहि राक्षसपुङ्गवम् ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
स्ववस्त्रोत्कर्षणं राजा कृतवान्वुद्धिमोहितः |
४ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
भीमसेन उवाच
स्ववाहुवलमाश्रित्य तिष्ठ त्वं भ्रातृभिः सह |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
स्ववाहुवलमाश्रित्य तेनाहं प्रीतिमांस्त्वय़ि |
४६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
स्ववाहुवलमाश्रित्य प्रवाधामो वय़ं रिपून् ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
स्ववाहुवलमाश्रित्य मुहूर्तमपि सञ्जय़ ||
८१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
मातो उवाच
स्ववाहुवलमाश्रित्य योऽभ्युज्जीवति मानवः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
स्ववाहुवलमाश्रित्य विदार्य च वरूथिनीम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
स्ववाहुवलमाश्रित्य विनाशय़ितुमोजसा ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
स्ववाहुवलमास्थाय़ न न्यवर्तत पाण्डवः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
स्ववाहुवलमास्थाय़ प्रतिव्यूहितुमञ्जसा ||
१९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
स्ववाहुवलमास्थाय़ रक्षितव्या ह्यनीकिनी |
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
स्ववाहुवलवीर्येण कुरूणामकरोद्यशः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
स्ववाहुवलवीर्येण धार्तराष्ट्रप्रिय़ैषिणा |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
स्ववाहुवलवीर्येण नागाश्वरथसङ्कुलः |
११३ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
स्ववाहुवलसम्पन्ना ह्रीनिषेधा यतव्रताः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
स्ववाहुविजितां कृत्स्नां प्रशासेम वसुन्धराम् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
स्ववाहुवीर्याद्गमय़े पराभवं; मत्पौरुषं विद्धि परः परेभ्यः ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
स्ववाहुवीर्येण जिताः सभीष्माः; किरीटिना लोकमहारथेन ||
१३१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
स्ववाह्वस्त्रवलेनाजौ धर्मेण परमेण च ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
स्ववित्तं तेन दत्तं तु दत्तात्रेय़ाय़ कारणे |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
स्वविनीतेन शास्त्रेण व्यवस्यन्ति तथापरे |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
स्वविलं हि जवेनाशु मार्जारः प्रय़यौ ततः ||
१९० ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
स्ववीर्यं क्षत्रिय़ाणां च वाह्वोर्धाता न्यवेशय़त् |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
स्ववीर्यं यः समाश्रित्य समाह्वय़ति वै परान् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
स्ववीर्यजीवी वृजिनान्निवृत्तो; दाता परेभ्यो न परोपतापी |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११९
सञ्जय़ उवाच
स्ववीर्यविजय़े युक्ता नैते परपरिग्रहाः ||
२१ ग
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
स्ववीर्यार्जितमर्थौघमवाप्य कुरुनन्दनः |
९ क