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शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिदव्याकुला चैव वुद्धिस्ते वदतां वर ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदष्टाङ्गसंय़ुक्ता चतुर्विधवला चमूः |
५३ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदष्टादशान्येषु स्वपक्षे दश पञ्च च |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदस्त्राणि सर्वाणि व्रह्मदण्डश्च तेऽनघ |
१११ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदाचरितां पूर्वैर्नरदेव पितामहैः |
८ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदात्मसमा वुद्ध्या शुचय़ो जीवितक्षमाः |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदात्मानमन्वीक्ष्य परांश्च जय़तां वर |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदात्मानमेवाग्रे विजित्य विजितेन्द्रिय़ः |
५० क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदाभ्यन्तरेभ्यश्च वाह्येभ्यश्च विशां पते |
५८ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदार्यो विशुद्धात्मा क्षारितश्चौरकर्मणि |
९३ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदाय़व्यये युक्ताः सर्वे गणकलेखकाः |
६२ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदाय़स्य चार्धेन चतुर्भागेन वा पुनः |
६० क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वय़ैकाग्रेण चेतसा |
७२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
कच्चिदेतत्त्वय़ा पार्थ श्रुतमेकाग्रचेतसा |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
कच्चिदेतैर्महादोषैर्न स्पृष्टोऽसि नराधिप |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिदेषा च ते वुद्धिर्वृत्तिरेषा च तेऽनघ |
९१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
कच्चिदेषां प्रिय़ो राजा कच्चिद्राज्ञः प्रिय़ाः प्रजाः ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
कच्चिद्गाण्डीवतः प्राणास्तथैव भरतर्षभ |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिद्गाण्डीवशव्देन न प्रणश्यत वै वलम् |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिद्दण्ड्येषु यमवत्पूज्येषु च विशां पते |
७८ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिद्दर्शय़से नित्यं मनुष्यान्समलङ्कृतान् |
७६ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिद्दारान्मनुष्याणां तवार्थे मृत्युमेय़ुषाम् |
४४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
धृतराष्ट्र उवाच
कच्चिद्दाय़ाननुच्छिद्य कोशस्तेऽभिप्रपूर्यते ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
कच्चिद्दाय़ान्मामकान्धार्तराष्ट्रो; द्विजातीनां सञ्जय़ नोपहन्ति ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिद्दुर्गाणि सर्वाणि धनधान्याय़ुधोदकैः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिद्दुर्योधनः सूत न गतो वै यमक्षय़म् |
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १००
धृतराष्ट्र उवाच
कच्चिद्दुर्योधनः सूत नाकार्षीत्पृष्ठतो रणम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
कच्चिद्दुर्योधनो मन्दः पश्चात्तापं करिष्यति ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
कच्चिद्दुर्योधनो मन्दः शममस्मासु धास्यति ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
कच्चिद्दुर्योधनो राजा फल्गुनेन निपातितम् |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
कच्चिद्दुर्योधनो राजा स नो जीवति सञ्जय़ ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
कच्चिद्दृष्टस्त्वय़ारण्ये सङ्गत्येह नलो नृपः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ५३
देवा ऊचुः
कच्चिद्दृष्टा त्वय़ा राजन्दमय़न्ती शुचिस्मिता |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
कच्चिद्दृष्टोऽचलश्रेष्ठ वनेऽस्मिन्दारुणे नलः ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
कच्चिद्दृष्ट्वा दस्युसङ्घान्समेता; न्स्मरन्ति पार्थस्य युधां प्रणेतुः ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
इन्द्र उवाच
कच्चिद्देवानां सुखकामोऽसि विप्र; कच्चिद्देवास्त्वां परिपालय़न्ति ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
मरुत्त उवाच
कच्चिद्देवाश्चास्य वशे यथाव; त्तद्व्रूहि त्वं मम कार्त्स्न्येन देव ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
कच्चिद्द्रोणो न नः सर्वान्क्षपय़ेत्परमास्त्रवित् |
६४ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिद्द्विषामविदितः प्रतिय़त्तश्च सर्वदा |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिद्द्वौ प्रथमौ यामौ रात्र्यां सुप्त्वा विशां पते |
७५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिद्धर्मसुतो राजा त्वय़ा प्रीत्याभिनन्दितः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिद्धर्मे त्रय़ीमूले पूर्वैराचरिते जनैः |
८७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिद्धृदि न ते शोको राजन्पुत्रविनाशजः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिद्धृष्टश्च शूरश्च मतिमान्धृतिमाञ्शुचिः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिद्धौम्यस्त्वदाचारैर्न पार्थ परितप्यते |
१० क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
कच्चिद्भगवतां पुण्यं तपोवनमिदं नृपः |
८२ क
वन पर्व
अध्याय १११
वेश्यो उवाच
कच्चिद्भवान्रमते चाश्रमेऽस्मिं; स्त्वां वै द्रष्टुं साम्प्रतमागतोऽस्मि ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिद्भीमः कुशली पाण्डवाग्र्यो; धनञ्जय़स्तौ च माद्रीतनूजौ ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
कच्चिद्भीष्मेण नो वैरमेकेनैव प्रशाम्यति |
४८ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
कच्चिद्भय़ादुपनतं क्लीवं वा रिपुमागतम् |
४५ क