कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
सम्यगस्तैः शरैः सर्वान्सहितानहनद्वहून् ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
गुरुरु उवाच
सम्यगाचर शुद्धात्मंस्ततः सिद्धिमवाप्स्यसि ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
सम्यगाराधितः पुत्र त्वय़ाहं वदतां वर |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
९
सूत उवाच
सम्यगाराधितास्तेन सञ्जीवतु मम प्रिय़ा ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
सम्यगाराध्य यः शक्रं वरं लेभे महाय़शाः ||
११३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८५
वृहस्पतिरु उवाच
सम्यगासेव्यमानस्य तुल्यं जातु न विद्यते ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
युधिष्ठिर उवाच
सम्यगाह गुणांस्तस्मै गोप्रदानस्य केवलान् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
सम्यगाह गुरुः क्षत्तरुपावर्तय़ पाण्डवान् ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
सम्यगाहारय़ोगाच्च सम्यक्चाध्ययनागमात् |
७५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
सम्यगीहा पुनरिय़ं यो वृद्धानुपसेवते |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
सम्यगुक्तं हि कर्णेन तच्छ्रुतं कौरव त्वय़ा |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
सम्यगुच्चारिता वाचः श्रूय़न्ते हि युधिष्ठिर |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
सम्यगेतेषु वर्तस्व त्रिषु लोकेषु भारत |
९ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
सम्यग्गोप्ता विदर्भाणां निर्जितारिगणः प्रभुः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
सम्यग्घि धर्मं चरतो नृपस्य; द्रव्याणि चाप्याहरतो यथावत् |
५६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
सम्यग्घुत इव स्विष्टः प्रशान्तोऽग्निरिवाध्वरे ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
सम्यग्घुत्वा हुतवहं मुनय़ः सिद्धिमागताः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
युधिष्ठिर उवाच
सम्यग्जिज्ञासमानाय़ प्रव्रूहि भरतर्षभ ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
मरुत्त उवाच
सम्यग्ज्ञाने वैषय़े वा त्यजेय़ं सङ्गतं यदि ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
सम्यग्दण्डधरो नित्यं राजा धर्ममवाप्नुय़ात् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
सम्यग्दण्डे स्थितिर्धर्मो धर्मो वेदक्रतुक्रिय़ाः |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
सम्यग्ददति ये चेष्टान्क्षान्ता दान्ता जितेन्द्रिय़ाः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
सम्यग्दर्शनमेतावद्भाषितं तव तत्त्वतः |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
सम्यग्दृष्टिर्महाप्राज्ञो वालं त्वां व्राह्मणोऽव्रवीत् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
सम्यग्द्वादश वर्षाणि वदरान्भक्षय़ेत्तु यः |
१५७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
सम्यग्धर्मानुरक्तस्य सिद्धिरात्मवतो यथा ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
सम्यग्युक्तास्तथा योगाः साङ्ख्याश्चामितदर्शनाः ||
१०० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
सम्यग्युक्त्वा यदात्मानमात्मन्येव प्रपश्यति |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
वैशम्पाय़न उवाच
सम्यग्वा ते गृहीतानि कच्चिदस्त्राणि भारत |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
सम्यग्विजेतुं यो वेद स महीमभिजाय़ते ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
सम्यग्विज्ञानिनः केचिन्मिथ्याविज्ञानिनोऽपरे |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
सम्यग्विजय़िनं दृष्ट्वा समन्तान्मन्त्रिभिर्वृतम् ||
१७९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
सम्यग्विनेता विनय़त्यतन्द्री; स्तांश्चाभिमन्युः सततं कुमारः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
भीष्म उवाच
सम्यग्वृत्ता निवर्तन्ते विपरीताः क्षय़ोदय़ाः ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
सम्यग्वृत्ताः स्वधर्मस्था न कुतश्चिद्भय़ान्विताः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
सम्यग्वृत्तिर्व्रह्मलोकं प्राप्नुय़ान्मध्यमः सुरान् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
सम्यग्वृत्तेष्वलुव्धेषु सततं धर्मचारिषु |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
सम्यग्वृत्तो हि राजा स धर्मनित्यो युधिष्ठिर ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
सम्यग्वृत्त्यानवद्याङ्गि तव भृत्यजनेष्वपि ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
सम्यग्वेदमधीय़ाना यजन्तो विविधैर्मखैः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
सम्यग्वेदान्प्राप्य शास्त्राण्यधीत्य; सम्यग्राष्ट्रं पालय़ित्वा च राजा |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
सम्यग्वेदान्प्राप्य शास्त्राण्यधीत्य; सम्यग्राष्ट्रं पालय़ित्वा महात्मा |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक्च गुरुसेवनात् ||
७४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
सम्यङ्निदर्शनं नाम प्रत्यक्षं प्रकृतेस्तथा |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
सम्यङ्नीता दण्डनीतिर्यथा माता यथा पिता ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
सम्यङ्मामभिरक्षन्तु ततः स्थास्यामि निश्चला ||
७५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
सम्यङ्मिथ्याप्रवृत्तेऽपि वर्तितव्यं गुराविह |
४७ क
सभा पर्व
अध्याय
१५
युधिष्ठिर उवाच
सम्राड्गुणमभीप्सन्वै युष्मान्स्वार्थपराय़णः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
सम्राड्राजा वसुर्नाम धर्मात्मा मां समाश्रितः ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
सम्राड्विजानात्विह जीवितार्थिनं; विनष्टसर्वस्वमुपागतं द्विजम् ||
७ ख