विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
कस्याय़ं विमलः खड्गो गव्ये कोशे समर्पितः |
३२ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
कस्याय़ं साय़को दीर्घः शिलीपृष्ठः शिलीमुखः |
३० क
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
कस्याय़मसितावापः पञ्चशार्दूललक्षणः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
कस्याय़मिति ते सर्वे मार्गमाणास्ततस्ततः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
कस्येदं कस्य वा नेदं कुतो वेदं न वा कुतः |
१२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
जनक उवाच
कस्येदमिति कस्य स्वमिति वेदवचस्तथा |
१५ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
कस्येदानीं विकारोऽय़ं यदिमे नरकं गताः ||
४६ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
कस्येमे पृथवो दीर्घाः सर्वपारशवाः शराः |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
कस्येमे शुकपत्राभैः पूर्वैरर्धैः सुवाससः |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
कस्येशो नः पराजैषीरिति त्वामाह द्रौपदी |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
कस्येह न व्यथेद्वुद्धिर्मृत्योरपि जिघांसतः ||
८९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
कस्यैते दारका राजन्देवपुत्रोपमाः शुभाः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
८८
अष्टक उवाच
कस्यैते प्रतिदृश्यन्ते रथाः पञ्च हिरण्मय़ाः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
कस्यैष को नु खल्वेष किं च स्वपिति भोगवान् ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
कस्यैषा वाग्भवेत्सत्या मोक्षो नास्ति गृहादिति ||
९ ग
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
कहोडो देवशर्मा च मौद्गल्यः शमसौभरः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
कह्लारैः कमलैश्चैव आचितानि समन्ततः ||
४९ ग
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
कह्वः शङ्कुर्निदान्तश्च सप्तैवैते महारथाः |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
कह्वाः प्रय़ान्ति मध्येन दक्षिणामभितो दिशम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
का चैका वृश्चते यज्ञं कां यज्ञो नातिवर्तते ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
जनमेजय़ उवाच
का तस्या भगवन्माता क्व संवृद्धा च शोभना |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
का ते प्रज्ञा कुतश्चैषा किं चैतस्याः पराय़णम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
का तैले का घृते व्रह्मन्मधुन्यप्स्वौषधेषु वा ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
का त्वं कथं रोदिषि कस्य हेतो; र्वाक्यं तथ्यं कामय़ेह व्रवीहि ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२४९
कोटिकाश्य उवाच
का त्वं कदम्वस्य विनम्य शाखा; मेकाश्रमे तिष्ठसि शोभमाना |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
का त्वं कमलगर्भाभे मम पुत्रप्रदाय़िनी |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
का त्वं केन च कार्येण सम्प्राप्ता चारुहासिनि |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
का त्वं ताम्रनखी श्यामा सुमृष्टमणिकुण्डला |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
का त्वं तिष्ठसि माय़ेव दीप्यमाना स्वतेजसा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
का त्वं वलेरपक्रान्ता रोचमाना शिखण्डिनी |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
८
सुदेष्णो उवाच
का त्वं व्रूहि यथा भद्रे नासि दासी कथञ्चन |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
का त्ववस्था तय़ोरद्य मदर्थमिति चिन्तय़े |
८४ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
का दिक्किमुदकं प्रोक्तं किमन्नं पार्थ किं विषम् |
६० क
विराट पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
का देवरूपा हृदय़ङ्गमा शुभे; आचक्ष्व मे का च कुतश्च शोभना |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
का नु गच्छेद्वनं दुर्गं पुत्रानुत्सृज्य मूढवत् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
युधिष्ठिर उवाच
का नु तासां वरस्त्रीणामवस्थाद्य भविष्यति |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३
युधिष्ठिर उवाच
का नु तासां वरस्त्रीणामवस्थाद्य भविष्यति |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
का नु तेषां गतिर्व्रह्मन्मित्रार्थे ये हता मृधे |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
का नु प्रज्ञा श्रुतं वा किं वृत्तिर्वा का नु ते मुने |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
का नु सीमन्तिनी त्वादृग्लोकेष्वस्ति पितृष्वसः |
९० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
का नु सीमन्तिनी मादृक्पृथिव्यामस्ति केशव ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
का प्रीतिः सत्त्वय़ुक्तस्य कृत्वोपधिकृतं जय़म् |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
का वा जातिः किं प्रमाणं च तेषां; ज्ञात्वा व्यक्तं तन्ममाचक्ष्व सूत ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
का वाहं तव को मे त्वं कोऽद्य ते मय़्यनुग्रहः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
भीष्म उवाच
का विवक्षास्ति वेदेषु निरारम्भस्य सर्वशः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
सेनजिदु उवाच
का वुद्धिः किं तपो विप्र कः समाधिस्तपोधन |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
२०८
वैशम्पाय़न उवाच
का वै त्वमसि कल्याणि कुतो वासि जलेचरी |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
का शक्तिर्मम देवेश प्रजाः स्रष्टुं नमोऽस्तु ते |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
का शक्तिर्मम सारथ्यं कर्तुं सङ्ग्राममूर्धनि ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
पिङ्गलो उवाच
का हि कान्तमिहाय़ान्तमय़ं कान्तेति मंस्यते ||
४९ ख