chevron_left  अभिवाद्योपसङ्गृह्यarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
अभिवाद्योपसङ्गृह्य ततः पृच्छेरनामय़म् ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवाद्योपसङ्गृह्य निषेदुः पार्थिवाज्ञय़ा ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवादय़ राजानं यथापूर्वमरिन्दम ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवादय़तां पार्थः कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवादय़ते पार्थः श्रोत्रे च परिपृच्छति ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवादय़ते वीर तं पश्य पुरुषर्षभ ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवादय़न्ति भवतीं पाण्डवाः सह कृष्णय़ा |
९७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
अभिवादय़न्ति वृद्धांश्च वय़स्यांश्च वय़स्यवत् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १६३
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवादय़मानं तु मूर्ध्न्युपाघ्राय़ पाण्डवम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवादय़मानं त्वां पाणिभ्यां भीमपूर्वजः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवादय़मानं त्वां शिरसा राजकुञ्जरः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवादय़ामहे व्रह्मन्नैतदन्येषु विद्यते |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
अभिवादय़ित्वा शिरसा गमिष्ये तव शासनात् |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवादय़िष्ये दिष्ट्येति तदिदं वितथीकृतम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
अभिवादय़े त्वा भगवन्स्वागतं ते द्विजोत्तम |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २७५
राम उवाच
अभिवादय़े त्वां राजेन्द्र यदि त्वं जनको मम |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अभिवादय़ेत वृद्धांश्च आसनं चैव दापय़ेत् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
अभिविष्यन्दते श्रीर्हि सत्यपि द्विषतो जनात् ||
३३ ग
वन पर्व
अध्याय २२६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवीक्षेत सिद्धार्थो वल्कलाजिनवाससम् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
अभिवीक्ष्य सहामात्यं दाशार्हः प्रहसन्निव ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२१
नारद उवाच
अभिवृष्टश्च वर्षेण नानापुष्पसुगन्धिना |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
अभिवृष्टो महामेघैर्यथा स्यात्पर्वतो महान् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
अभिवृष्टो यथा मेघैर्गिरिर्गैरिकधातुमान् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
अभिव्यक्तः परेषां च कृत्स्नो भुवि पराजय़ः ||
५३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
वाय़ुरु उवाच
अभिशप्तश्च भगवान्गौतमेन पुरन्दरः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
अभिशस्तमपि ह्येषां कृपाय़ीत विशां पते |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७८
भीष्म उवाच
अभिशस्तमिवात्मानं मन्यन्ते तेन कर्मणा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अभिशस्तवत्प्रपश्यन्ति दरिद्रं पार्श्वतः स्थितम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
अभिशस्तस्तथा स्तेनः शिल्पं यश्चोपजीवति ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
अभिशस्ता इवाभूवन्ध्यानमूकत्वमास्थिताः ||
४ ग
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
अभिशापः स मात्रास्य भगवन्न भवेदिति ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
अभिशापभय़ात्त्रस्तो न च किञ्चिदुवाच ह ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५५
वासुदेव उवाच
अभिशापभय़ाद्भीतो भवन्तं नोपसर्पति ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५५
वासुदेव उवाच
अभिशापभय़ाद्भीतो भवन्तं नोपसर्पति ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
अभिशापाच्च रामस्य व्राह्मणस्य च भाषणात् |
६ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
अभिषक्तो ह्यभिषजेदाहन्याद्गुरुणा हतः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
अभिषक्तोऽस्मि मन्दात्मन्न मे जीवन्विमोक्ष्यसे ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
अभिषङ्गस्तु कामेषु महामोह इति स्मृतः |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
अभिषङ्गात्प्रकुपितो विप्रलव्धस्त्वय़ानघ ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय ६७
अर्जुन उवाच
अभिषङ्गादहं भीतो मिथ्याचारात्परन्तप |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
अभिषङ्गावरोधाभ्यां वद्धस्त्वं प्राकृतो मय़ा ||
१६६ ख
विराट पर्व
अध्याय ४६
अश्वत्थामो उवाच
अभिषज्यमाने हि गुरौ तद्वृत्तं रोषकारितम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
अभिषिक्तं च श्रुत्वैनं कृतार्थोऽस्मीति चिन्तय़न् ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
अभिषिक्तं महात्मानं परिवार्योपतस्थिरे ||
११० ख
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
अभिषिक्तं महासेनमपश्यन्त दिवौकसः |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
अभिषिक्तः प्रकृतिभी राजपुत्रः स पार्थिवः |
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
अभिषिक्तः स शुशुभे साम्राज्येन नराधिप ||
६१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
अभिषिक्तः सुरगणैर्वरुणो भरतर्षभ ||
९२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिषिक्तश्च तत्रैव समागम्य मरुद्गणैः |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
अभिषिक्तस्ततो देवैर्वरुणोऽपि महाय़शाः |
११ क