शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
विव्यधुर्निशितैर्वाणैः कङ्कवर्हिणवाजितैः |
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
विव्यधुर्निशितैर्वाणैः सर्वांस्तानुद्यताय़ुधान् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
विव्यधुर्निशितैर्वाणैस्तपनीय़विभूषितैः ||
४० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
विव्यधुश्चैव जघ्नुश्च समासाद्य महाहवे ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
विव्यधुस्तं महेष्वासाः समरे छिद्रदर्शिनः ||
३६ ख
विराट पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
विव्याध कर्णं कौन्तेय़स्तीक्ष्णेनोरसि वीर्यवान् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
विव्याध कर्णं विंशत्या पुनरन्यैः शितैः शरैः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
विव्याध कर्णः पुरुषप्रवीरं; धनञ्जय़ं तिर्यगवेक्षमाणम् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
विव्याध कुपितो यज्ञं निर्भय़स्तु भवस्तदा |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
विव्याध कुपितो यज्ञं निर्भय़स्तु भवस्तदा |
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
विव्याध केशवं षष्ट्या नाराचैरर्जुनं त्रिभिः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
विव्याध कौरवश्रेष्ठं नवत्या नतपर्वणाम् ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
विव्याध क्षत्रधर्माणं रणे सर्वाय़सैः शरैः ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
विव्याध गात्रेषु हय़ांश्च सर्वा; न्विराटपुत्रं च शरैर्निजघ्ने ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
विव्याध गौतमं चापि षड्भिर्भल्लैः सुतेजनैः ||
८२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
विव्याध घोरैर्यमदण्डकल्पैः; शितैः शरैः पञ्चशतैः समन्तात् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
विव्याध च चतुःषष्ट्या शराणां नतपर्वणाम् ||
९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
विव्याध च तथा सूतं चतुर्भिश्चतुरो हय़ान् ||
४६ ग
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
विव्याध च नरश्रेष्ठो नाराचैर्वहुभिस्त्वरन् |
६० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
विव्याध च पृषत्केन सुतीक्ष्णेन महामृधे |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
विव्याध च रणे द्रोणं पञ्चभिर्नतपर्वभिः |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
विव्याध च रणे द्रोणमनुमान्य विशां पते |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
विव्याध च रणे राजन्सात्यकिं सत्यविक्रमम् |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
विव्याध च सुसङ्क्रुद्धः शरैस्त्रिभिरजिह्मगैः ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
विव्याध च हय़ानस्य ध्वजं सारथिमेव च |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
विव्याध चाश्वान्निशितैस्तस्याष्टाभिः शिलीमुखैः ||
८४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
विव्याध चास्य त्वरितः सूतं पञ्चभिराशुगैः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं दशभिः पितुर्वधमनुस्मरन् ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं दशभिः पृषत्कै; र्मर्मस्वसक्तं प्रसभं किरीटी |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं दशभिः सम्यगस्तैः शितैः शरैः |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं दशभिः स्मय़मानः स्तनान्तरे ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं दशभिर्नाराचैर्मर्मभेदिभिः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं दशभिर्वाणैस्तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
२१ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं नवभिः क्रुद्धो नृत्यन्निवेषुभिः |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं वहुभिः सम्यगस्तैः शितैः शरैः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं वहुभिः साय़कैर्नतपर्वभिः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं संरव्धो वाणेनैकेन वीर्यवान् ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं सप्तत्या नाराचानां महावलः ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं समरे त्रिसप्तत्या शिलीमुखैः ||
५५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
विव्याध चैनं समरे नाराचैस्तत्र सप्तभिः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
विव्याध तरसा राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
विव्याध तुरगांश्चास्य त्रिभिर्वाणैर्महारथः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
विव्याध तुरगान्वीरः पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
विव्याध दशभिः कर्णं सूतमश्वांश्च पञ्चभिः ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
विव्याध दशभिः पार्थ तांश्चैवान्यांस्त्रिभिस्त्रिभिः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
विव्याध दशभिर्द्रोणः सर्वपारशवैः शरैः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
विव्याध दशभिर्वाणैस्तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
विव्याध दशभिर्वाणैस्त्वरितः कङ्कपत्रिभिः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
विव्याध दशभिस्तीक्ष्णैः शरैः कनकभूषणैः |
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
विव्याध दशभिस्तीक्ष्णैः शरैर्वज्रनिपातिभिः |
७ क