उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
विद्याद्वहु पठन्तं तु वहुपाठीति व्राह्मणम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
विद्याधरगणाकीर्णान्युतान्वानरकिंनरैः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
विद्याधरगणाश्चैव स्रग्विणः प्रिय़दर्शनाः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
विद्याधरा दानवाश्च गुह्यका राक्षसास्तथा ||
२५ ग
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
विद्याधराः समुत्पेतुस्तस्य शृङ्गनिवासिनः |
७७ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
विद्याधरानुचरितं किंनरीभिस्तथैव च |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
विद्याधरानुचरितं नानारत्नसमाकुलम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
विद्याधिकमथालक्ष्य धनुर्वेदे धनञ्जय़म् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
विद्याभिजनसम्पन्ने व्राह्मणे गवि हस्तिनि |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
विद्याम युष्मानिति भाषमाणो; महात्मनः पाण्डुसुताः स्थ कच्चित् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
विद्यामदो धनमदस्तृतीय़ोऽभिजनो मदः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
विद्यामधीत्य तां राजंस्त्वय़ोक्तामरिमर्दन |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
शुक्र उवाच
विद्यामिमां प्राप्नुहि जीवनीं त्वं; न चेदिन्द्रः कचरूपी त्वमद्य ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३३
भीष्म उवाच
विद्यामय़ोऽन्यः पुरुषस्तात कर्ममय़ोऽपरः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
विद्यामय़ोऽय़ं पुरुषो न तु कर्ममय़ः स्मृतः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
विद्यार्थानां च जिज्ञासा श्रेय़ एतदसंशय़म् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४९
कुन्त्यु उवाच
विद्यार्थिनो हि मे पुत्रान्विप्रकुर्युः कुतूहलात् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
विद्यार्थी प्राप्नुय़ाद्विद्यां सुखार्थी प्राप्नुय़ात्सुखम् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
विद्यालक्षणसम्पन्नाः सर्वत्राम्नाय़दर्शिनः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
विद्यावद्भिः श्रितां गङ्गां पुमान्को नाम नाश्रय़ेत् ||
६८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
विद्यावलं पन्नगेन्द्र पश्य मेऽस्मिन्वनस्पतौ |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
विद्यावलमुपाश्रित्य न ह्यस्त्यस्यौरसं वलम् ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
विद्यावलाद्यो व्यजय़त्पाण्ड्यक्रथककैशिकान् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
विद्याविदो लोकविदः परलोकान्ववेक्षकान् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
विद्याविद्यार्थतत्त्वेन मय़ोक्तं ते विशेषतः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
करालजनक उवाच
विद्याविद्ये च भगवन्नक्षरं क्षरमेव च |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
विद्याविद्ये त्विदानीं मे त्वं निवोधानुपूर्वशः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
विद्याविद्येति विख्याते श्रुतिशास्त्रार्थचिन्तकैः ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
विद्याविनय़सम्पन्ने व्राह्मणे गवि हस्तिनि |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
विद्याविशेषमिच्छामि ज्ञातुमाचार्य तत्त्वतः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
विद्यावीर्यं मूलवीर्यं जपहोमस्तथागदाः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
विद्यावृद्धा वय़ोवृद्धाः क्षत्रिय़ाः क्षत्रिय़र्षभ |
५२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
विद्यावृद्धान्सदैव त्वमुपासीथा युधिष्ठिर |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
विद्यावेदव्रतवति तद्दानफलमुच्यते ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
विद्यावेदव्रतस्नाता दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
विद्यावेदव्रतस्नाता व्राह्मणाः पुण्यकर्मिणः ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
विद्यावेदव्रतस्नातानव्यपाश्रय़जीविनः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
विद्याशीलवय़ोवृद्धान्वुद्धिवृद्धांश्च भारत |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
कुन्त्यु उवाच
विद्याशूरं तपःशूरं दमशूरं तपस्विनम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
विद्यासहाय़वन्तं मामादित्यस्थं सनातनम् |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
विद्यासहाय़वन्तं मामादित्यस्थं सनातनम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
विद्यासहाय़वान्देवो विष्वक्सेनो हरिः प्रभुः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
विद्यासहाय़ो यत्रास्ते भगवान्हव्यकव्यभुक् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
विद्यास्नाता व्रतस्नाता ये व्यपाश्रित्यजीविनः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
विद्यास्नातास्तपःस्नाता यदि राजा न पालय़ेत् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
विद्यास्वभिविनीतानां दान्तानां मृदुभाषिणाम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
विद्याहीनस्तमोध्वस्तो नाभिजानाति केशवम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
विद्याहीनानविज्ञानाल्लोभोऽप्यभिभविष्यति ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
विद्याय़ामर्थलाभे वा मातुरुच्चार एव सः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४९
युधिष्ठिर उवाच
विद्याय़ुक्तो ह्यविद्यश्च धनवान्दुर्गतस्तथा ||
६ ग