शान्ति पर्व
अध्याय
२६६
भीष्म उवाच
कामक्रोधौ वशे कृत्वा निनीषेद्व्रह्मणः पदम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
कामक्रोधौ वशे कृत्वा निनीषेद्व्रह्मणः पदम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
कामक्रोधौ वशे कृत्वा निनीषेद्व्रह्मणः पदम् ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
कामक्रोधौ वशे कृत्वा व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
कामक्रोधौ वशे यस्य तं देवा व्राह्मणं विदुः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
विरूप उवाच
कामक्रोधौ विद्धि नौ त्वमावाभ्यां कारितो भवान् |
११४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
कामक्रोधौ शरीरस्थौ प्रज्ञानं तौ विलुम्पतः ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
कामक्रोधौ समुत्सृज्य ते व्रुवन्तु यथामति ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
कामक्रोधौ हि पुरुषमर्थेभ्यो व्यपकर्षतः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
कामगाः कामचारिण्यः कामात्कामांश्च भुञ्जते ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
कामगेन यथा मुख्यैरमात्यैः संवृतो वशी ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
कामगेन विचित्रेण दिव्यगन्धवता तथा ||
३१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
कामगेन विमानेन दिव्याभरणभूषितः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
कामगेन विमानेन स वै चरति च्छन्दतः |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
कामगेन स सौभेन क्षिप्त्वा मां कुरुनन्दन ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
कामगेन स सौभेन शाल्वः पुनरुपागमत् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
कामगैः सैन्यसुग्रीवमेघपुष्पवलाहकैः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
कामग्राहगृहीतस्य ज्ञानमप्यस्य न प्लवः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
कामग्राहेण घोरेण वेदय़ज्ञप्लवेन च ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
कामचारविहारिण्यः स्वतन्त्राश्चारुलोचने ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
कामचारी कामगमः पूज्यमानोऽप्सरोगणैः ||
९४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
कामचारी तु कामेन य इन्द्रिय़सुखे रतः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
कामचारी सुधाहारो विमानवरमास्थितः |
९२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
कामजान्याहुराचार्याः प्रोक्तानीह स्वय़म्भुवा ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
कामतो मुच्यमानस्तु धूम्राभ्रादिव चन्द्रमाः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
कामतो रममाणस्य मीनस्येवाम्भसः क्षय़े ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
कामतो हि धनं राजा पारक्यं यः प्रय़च्छति |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
कामतोय़प्रदं लोके नरपर्जन्यमर्जुनम् ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः |
८३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
कामद्वेषसमाय़ुक्तो मोहात्प्रकुरुते भवान् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
कामद्वेषाभिभूतत्वादहङ्कारवशं गताः ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
कामद्वेषावनादृत्य स राज्ञो धर्म उच्यते ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
व्राह्मण उवाच
कामद्वेषावुद्भवतः स्वभावा; त्प्राणापानौ जन्तुदेहान्निवेश्य ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
कामद्वेषौ च जय़ति तदात्मानं प्रपश्यति ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
कामद्वेषौ पृथग्दृष्ट्वा तपः कृत उपासते ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
कामद्वेषौ वशे कृत्वा सतां वर्त्मानुवर्तते ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
कामन्दमृषिमासीनमभिवाद्य नराधिपः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
कामन्दस्य च संवादमङ्गारिष्ठस्य चोभय़ोः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९८
नारद उवाच
कामपुष्पफलांश्चैव पादपान्कामचारिणः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
कामप्रलापिनोऽन्योन्यं तेषु धर्मः कथं भवेत् ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
कामप्रसक्तः पुरुषः किमकार्यं विवर्जय़ेत् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भृगुरु उवाच
कामभोगप्रिय़ास्तीक्ष्णाः क्रोधनाः प्रिय़साहसाः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
कामभोगान्परित्यज्य शतशृङ्गमितो गतः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
६५
सुदेव उवाच
कामभोगैः प्रिय़ैर्हीनां हीनां वन्धुजनेन च |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
काममङ्गानि मे सीते दुनोतु मकरध्वजः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
विकृत उवाच
काममत्रापराधो मे दण्ड्यमाज्ञापय़ प्रभो ||
१०१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०९
मृग उवाच
काममन्युपरीतापि वुद्ध्यङ्गरहितापि च |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
काममन्युपरीतेन तृष्णय़ा मोहितेन च ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
काममन्यूद्धतं यत्स्यान्नित्यमत्यन्तमोहितम् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
काममभ्यस वा मा वा न त्वां योत्स्ये कथञ्चन |
४१ क