आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
तं चैव धर्मं पौराणं तिर्यग्योनिगताः प्रजाः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
तं चैव निकृतिप्रज्ञं पाञ्चाल्यं पापचेतसम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
तं चैवाङ्कगतं दृष्ट्वा वालं पञ्चशिखं पुनः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
कश्यप उवाच
तं चैवान्वभिषिच्येत तथा धर्मो विधीय़ते |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
तं चैवानय़ सोदर्यं पानीय़ं च त्वमानय़ ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
तं चोदनाभिर्मतिमानात्मानं चोदय़ेदथ |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
तं चोपहारं स्वकृतं नैशं नैत्यकमात्मनः |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
तं छाद्यमानं विशिखैर्दृष्ट्वा संनतपर्वभिः |
१९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
तं जघ्ने रथिनां श्रेष्ठं धृष्टद्युम्नं कथं नु सः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
११
मैत्रेय़ उवाच
तं जटाजिनसंवीतं तपोवननिवासिनम् |
१२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
तं जना वहु मन्यन्ते येऽर्थशास्त्रविशारदाः ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
तं जनाः कथय़न्तीह यावद्धरति गौरिय़म् ||
६३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
वामदेव उवाच
तं जहि त्वं मद्वचनात्प्रणुन्न; स्तूर्णं प्रिय़ं साय़कैर्घोररूपैः ||
७३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२७
लोमश उवाच
तं जातं मातरः सर्वाः परिवार्य समासते |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
तं जातमपरं दृष्ट्वा कालानलसमद्युतिम् |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४०
व्रह्मो उवाच
तं जानन्व्राह्मणो विद्वान्न प्रमोहं निगच्छति ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५०
भीष्म उवाच
तं जालेनोद्धृतं दृष्ट्वा ते तदा वेदपारगम् |
२० क
विराट पर्व
अध्याय
४८
अर्जुन उवाच
तं जित्वा विनिवर्तिष्ये गाः समादाय़ वै पुनः ||
१२ ग
सभा पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
तं जित्वा हाटकं नाम देशं गुह्यकरक्षितम् |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
तं ज्ञात्वा पतितं कूपे भ्रातरावेकतद्वितौ |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
तं जय़न्तमनीकानि तानि तान्येव भारत |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
तं जय़न्तमनीकानि भारद्वाजं ततस्ततः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
तं तं तापय़ते देशमपि राज्ञः समृद्धिनः ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तं तं देवं समुद्दिश्य पक्षिणः पशवश्च ये ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
तं तं देववरप्राप्त्या सैन्धवः प्रत्यवारय़त् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
तं तं निय़ममास्थाय़ प्रकृत्या निय़ताः स्वय़ा ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
तं तं युक्तो निषेवेत न चैव विचलेत्ततः ||
२५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
तं तं विसृष्टवान्व्यासो वरदो धर्मवत्सलः ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
तं ततोऽन्वेषमाणास्ते वने वननिवासिनम् |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
तं तत्र वसमानं तु जैगीषव्यं महामुनिम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
तं तथा कृपय़ाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
तं तथा कोष्ठकीकृत्य रथवंशेन मारिष |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
तं तथा गर्जमानं तु मेघदुन्दुभिनिःस्वनम् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
मतङ्ग उवाच
तं तथा तपसा युक्तमुवाच हरिवाहनः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
तं तथा तप्यमानं तु तपस्तीव्रं महामुनिम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
९५
लोमश उवाच
तं तथा दुःखितं दृष्ट्वा सभार्यं पृथिवीपतिम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१६९
गन्धर्व उवाच
तं तथा निश्चितात्मानं महात्मानं महातपाः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तं तथा पतितं दृष्ट्वा वान्धवा येऽस्य केचन |
४४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
तं तथा पतितं भूमौ निःसञ्ज्ञं प्रेक्ष्य वान्धवाः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
तं तथा पतितं शूरं तावकाः पर्यवारय़न् |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
तं तथा भस्मभूतं तु दृष्ट्वा पाण्डुसुताः प्रभो |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
तं तथा भाषमाणं तु धर्मराजं युधिष्ठिरम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
तं तथा भाषमाणं तु विदुरः प्रत्यभाषत |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
तं तथा भीमकर्माणं प्रगृहीतमहागदम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
४०
सूत उवाच
तं तथा मन्त्रिणो दृष्ट्वा भोगेन परिवेष्टितम् |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
तं तथा महतीं सेनां द्रावय़न्तं पुनः पुनः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
तं तथा मोहितं दृष्ट्वा सारथिर्जवनैर्हय़ैः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
तं तथा युध्यमानं च विनिघ्नन्तं च तावकान् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
तं तथा युध्यमानं तु माय़ाय़ुद्धविशारदम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
तं तथा वादिनं कृष्णा प्रत्युवाच मनस्विनी |
१२ क