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भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् |
४३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २४
नारद उवाच
कामात्सञ्जाय़ते शुक्रं कामात्सञ्जाय़ते रसः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
कामादन्यत्र सम्भूतौ सर्वाभावाय़ संमितौ ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५२
युधिष्ठिर उवाच
कामादन्ये क्षय़ादन्ये कारणैरपरैस्तथा |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
कामादर्थं वृणीते यः स वै पण्डित उच्यते ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
कामाद्धिमान्ते परिवर्तमानः; काष्ठातिगो मातरिश्वेव नर्दन् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२३
वासुदेव उवाच
कामाद्वा यदि वा लोभात्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
कामानभीप्सितांस्तुभ्यं दाता नास्त्यत्र संशय़ः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
कामानवाप्नुय़ात्कामी प्रजार्थी चाप्नुय़ात्प्रजाः ||
१२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
कामानात्मनि संय़म्य क्षीणतृष्णः समाहितः |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
कामानामपि दातारं कर्तारं मानसान्त्वय़ोः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १५९
वैशम्पाय़न उवाच
कामानुपहरिष्यन्ति यक्षा वो भरतर्षभाः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७२
भीमसेन उवाच
कामानुवन्धवहुलं नोग्रमुग्रपराक्रमम् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
कामानुसारी पुरुषः कामाननु विनश्यति |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
कामानुसारी पुरुषः कामाननु विनश्यति ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
कामान्मनोऽभिलषितान्व्राह्मणेभ्यो ददौ प्रभुः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
युधिष्ठिर उवाच
कामान्मोहाच्च लोभाच्च भय़ं पश्यत्सु भारत ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५७
भीष्म उवाच
कामान्मोहाच्च लोभाच्च लौल्यमेतत्प्रवर्तितम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
कामान्वृणीष्व लोकांश्च प्राप्तोऽसि परमां गतिम् ||
३९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
कामान्व्युदस्य धुनुते यत्किञ्चित्पुरुषो रजः |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
कामान्व्युदस्य धुनुते यत्किञ्चित्पुरुषो रजः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
कामान्सर्वान्पार्थिवानेकसंस्था; न्यो वै दद्यात्कामदुघां च धेनुम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
कामाभिध्या स्वशरीरं दुनोति; यय़ा प्रय़ुक्तोऽनुकरोति दुःखम् ||
४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
कामाभिभूतः क्रोधाद्वा यो मिथ्या प्रतिपद्यते |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
कामार्तं नारदं क्रुद्धः शशापैनं ततो भृशम् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
कामार्तं निर्जनेऽरण्ये प्रत्यभाषत किञ्चन ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
कामार्थः परिहीणो मे तप्येऽहं तेन पुत्रकाः ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
कामार्थलाभेन तथैव भूय़ो; न तृप्यते सर्पिषेवाग्निरिद्धः |
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
कामार्थावनुपाय़ेन लिप्समानो विनश्यति ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
कामार्थौ पृष्ठतः कृत्वा लोभमोहानुसारिणौ |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
कामार्थौ लिप्समानस्तु धर्ममेवादितश्चरेत् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
कामाल्लोभाच्च धर्मस्य प्रवृत्तिं यो न पश्यति |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
कामाल्लोभादनुक्रोशाद्द्वेषाच्च भरतर्षभ ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
कामाश्चोपद्रवाश्चैव तदा दैवतकारिताः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
कामाशय़ो हि स्त्रीवर्गः शोकमेवं प्रहास्यति ||
३३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
कामिदानीं नरव्याघ्र श्लक्ष्णय़ा स्मितय़ा गिरा |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
कामिनः सह कान्ताभिः परस्परमनुव्रताः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
कामी च कामिनीं लव्ध्वा कर्मेदं नस्तथाविधम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
कामे वेदे लौकिके यत्फलं च; विष्वक्सेने सर्वमेतत्प्रतीहि ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
कामेन ताताभिवदाम्यहं त्वां; कस्यासि राज्ञो विषय़ादिहागतः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
अष्टावक्र उवाच
कामेन मोहिता चाहं त्वां भजन्तीं भजस्व माम् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
कामेन युक्ता ऋषय़स्तपस्येव समाहिताः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय ६४
वृहदश्व उवाच
कामेनां शोचसे नित्यं श्रोतुमिच्छामि वाहुक ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
कामेषु चाप्यनावृत्तः प्रसन्नात्मात्मविच्छुचिः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
कामैः सन्तर्पय़ामास कृपणांस्तर्ककानपि ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
कामो नामापरस्तत्र समपद्यत वै प्रभो ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
कामो यवीय़ानिति च प्रवदन्ति मनीषिणः |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
कामो रतिफलश्चात्र सर्वे चैते रजस्वलाः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १२२
द्रुपद उवाच
कामो वैनं विहरति क्रोधश्चैनं प्रवृश्चति ||
५ ख